अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच ईरान में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की बढ़ती ताकत सत्ता संतुलन पर चिंता बढ़ा रही है।
अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच तेहरान की सत्ता संरचना को लेकर एक नई बहस तेज हो गई है। कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में दावा किया जा रहा है कि ईरान में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) अब केवल सैन्य संगठन नहीं रह गया, बल्कि वह धीरे-धीरे तेहरान में वास्तविक सत्ता का केंद्र बनता जा रहा है।
राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के हाशिये पर जाने और सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के उत्तराधिकारी माने जा रहे मोजतबा खामेनेई तक पहुंच सीमित होने की खबरों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ईरान भी पाकिस्तान जैसी ‘सैन्य-प्रभुत्व वाली व्यवस्था’ की ओर बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिति पाकिस्तान जैसी तो दिख रही है, लेकिन ईरान का मॉडल उससे भी अधिक कठोर और जटिल हो सकता है, क्योंकि यहां सेना, धर्मतंत्र और सुरक्षा तंत्र पहले से ही गहराई से जुड़े हुए हैं।
कैसे काम करती है ईरान की सत्ता व्यवस्था?
ईरान में 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद बने सर्वोच्च नेता को सबसे ऊपर रखा गया था। सेना और IRGC के शीर्ष कमांडरों की नियुक्ति से लेकर राष्ट्रीय रणनीति तय करने तक का अधिकार ईरान के सुप्रीम लीडर के हाथ में दिया गया।
देखा जाए तो व्यवहारिक स्तर पर सत्ता का संतुलन हमेशा अस्थिर रहा है। अब हालिया रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि IRGC अमेरिकी तनाव और आंतरिक अनिश्चितता के बीच सरकारी संस्थाओं पर अपनी पकड़ और मजबूत कर रहा है।
ईरान इंटरनेशनल समेत कई मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि IRGC ने महत्वपूर्ण सरकारी कार्यों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर लिया है और राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन राजनीतिक गतिरोध की स्थिति में पहुंच गए हैं।
कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि मोजतबा खामेनेई की वास्तविक स्थिति और पहुंच को लेकर अनिश्चितता के बीच IRGC ही प्रमुख फैसले ले रहा है।
क्या है IRGC?
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की स्थापना 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद हुई थी। इसका उद्देश्य नई इस्लामिक व्यवस्था की रक्षा करना और पारंपरिक सेना के समानांतर एक वैचारिक सैन्य बल तैयार करना था।
ईरान-इराक युद्ध (1980-88) के दौरान IRGC तेजी से मजबूत हुआ। युद्ध ने उसे सैन्य अनुभव, संसाधन और राजनीतिक प्रभाव दिलाया। धीरे-धीरे यह संगठन केवल सैन्य ताकत नहीं रहा, बल्कि ईरान की राजनीति, आंतरिक सुरक्षा और अर्थव्यवस्था का प्रमुख स्तंभ बन गया।
आज IRGC का प्रभाव निर्माण, तेल-गैस, दूरसंचार, बैंकिंग, परिवहन, रियल एस्टेट और आयात-निर्यात जैसे क्षेत्रों तक फैला हुआ है। उसकी इंजीनियरिंग शाखा ‘खातम अल-अनबिया’ बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट संभालती है।
पश्चिमी प्रतिबंधों के दौर में IRGC से जुड़े नेटवर्क ने अनौपचारिक व्यापार और प्रतिबंधों से बचने वाले रास्तों के जरिए अपनी आर्थिक ताकत और बढ़ाई।
कई अनुमानों के मुताबिक, IRGC से जुड़े संस्थान ईरान की अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से पर प्रभाव रखते हैं। इससे उसे राजनीतिक शक्ति के साथ आर्थिक नियंत्रण भी मिला है।
विश्लेषकों का कहना है कि IRGC अब राज्य के भीतर राज्य जैसा स्वरूप ले चुका है। उसके पूर्व अधिकारी सरकार, न्यायपालिका, प्रांतीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों में अहम पदों पर हैं।
हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन ईरान की सत्ता संरचना में सुरक्षा प्रतिष्ठान की बढ़ती भूमिका को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
यानी उसे सत्ता पर नियंत्रण के लिए किसी औपचारिक तख्तापलट की जरूरत नहीं है। वह संस्थाओं के भीतर रहकर भी निर्णयों को प्रभावित कर सकता है।
मोजतबा खामेनेई तक नहीं पहुंच
रिपोर्टों के अनुसार, अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई तक पहुंच बेहद सीमित कर दी गई है। अमेरिकी खुफिया सूत्रों के हवाले से दावा किया गया कि वे एक गुप्त स्थान पर हैं और उनसे संपर्क केवल विशेष माध्यमों से ही संभव है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी व्यवस्था में जिसके पास पहुंच है वही असली शक्ति बन जाती है। यदि शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच सुरक्षा प्रतिष्ठान नियंत्रित करने लगे, तो वास्तविक सत्ता भी उसी के हाथों में चली जाती है।
ईरान की पाकिस्तान से तुलना क्यों?
पाकिस्तान में लंबे समय से सेना को वास्तविक शक्ति केंद्र माना जाता रहा है। वहां चुनी हुई सरकारें मौजूद रहती हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और कई अहम फैसलों में सेना का निर्णायक प्रभाव रहता है।
फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के दौर में यह प्रभाव और मजबूत माना जा रहा है। कई विश्लेषणों में कहा गया कि पाकिस्तान में नागरिक सरकारें अक्सर सीमित अधिकार वाली राजनीतिक संरचना बनकर रह जाती हैं।
ईरान में भी अब ऐसी ही तुलना की जा रही है, जहां राष्ट्रपति और नागरिक संस्थाएं बनी रहें, लेकिन वास्तविक फैसले सुरक्षा प्रतिष्ठान ले। लेकिन ईरान का मॉडल अलग और अधिक कठोर हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान पूरी तरह पाकिस्तान नहीं बन सकता, क्योंकि वहां की व्यवस्था पहले से ही धर्म और सुरक्षा ढांचे के मिश्रण पर आधारित है।
पाकिस्तान में सेना एक नागरिक संविधान के ऊपर प्रभाव रखती है, जबकि ईरान में IRGC स्वयं क्रांतिकारी राज्य संरचना का हिस्सा है। इसलिए यदि IRGC का नियंत्रण और बढ़ता है तो यह केवल सैन्य प्रभुत्व नहीं बल्कि एक ऐसे सुरक्षा-धर्मतांत्रिक राज्य का रूप ले सकता है, जहां धार्मिक नेतृत्व प्रतीकात्मक रह जाए और वास्तविक संचालन सुरक्षा तंत्र के हाथ में चला जाए।
विश्लेषकों के अनुसार, ईरान में उत्तराधिकार की राजनीति और सुरक्षा राजनीति अब एक-दूसरे से जुड़ती दिख रही हैं। यदि मोजतबा खामेनेई वास्तव में सीमित पहुंच में हैं और IRGC सत्ता के केंद्र पर नियंत्रण मजबूत कर रहा है तो यह केवल नीति का संघर्ष नहीं बल्कि ‘ईरान के अगले दौर का वास्तविक संरक्षक कौन होगा’ इसकी लड़ाई बन सकती है।





