पश्चिम बंगाल में भाजपा का राजनीतिक सफर भारतीय जनसंघ की स्थापना से शुरू होकर 74 वर्षों के संघर्ष और विस्तार की कहानी है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा स्थापित पार्टी ने विधानसभा और लोकसभा चुनावों में लगातार अपनी उपस्थिति मजबूत की है, जो दशकों के संगठनात्मक कार्य का परिणाम है।
पश्चिम बंगाल में भाजपा का राजनीतिक सफर लंबे संघर्ष और लगातार विस्तार की कहानी रहा है। भारतीय जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर 1951 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी। उस समय पार्टी का मुख्य आधार पूर्वी बंगाल यानी अब बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थियों के पुनर्वास और उनके मुद्दे थे।
1952 के विधानसभा चुनाव से जनसंघ ने बंगाल की राजनीति में अपनी मौजूदगी दर्ज करानी शुरू की। तब पार्टी को 9 सीटें और 5.8 प्रतिशत वोट मिले थे। अब 2026 के चुनाव में भाजपा 207 सीटों और करीब 46 प्रतिशत वोट शेयर तक पहुंच गई है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक बंगाल में भाजपा का यह उभार अचानक नहीं, बल्कि कई दशकों के संगठनात्मक विस्तार और जमीनी काम का परिणाम है। 2016 तक भाजपा राज्य में सीमित ताकत मानी जाती थी, लेकिन इसके बाद पार्टी तेजी से बढ़ी।
विधानसभा चुनाव में भाजपा का सफर
- 1952: 9 सीटें, 5.8% वोट
- 1957-1971: जनसंघ की सीटें शून्य रहीं, वोट शेयर करीब 1%
- 1977: जनता पार्टी में विलय के दौरान 15 सीटें और 21.46% वोट
- 1982-2011: लगातार शून्य सीटें
- 2016: 3 सीटें, 10.16% वोट
- 2021: 77 सीटें, 38.15% वोट
- 2026: 207 सीटें, करीब 46% वोट
दिलचस्प बात यह भी रही कि 2001 में भाजपा ने ममता बनर्जी के साथ गठबंधन किया था, लेकिन तब पार्टी को कोई सीट नहीं मिली थी और वोट शेयर सिर्फ 5.19 प्रतिशत रहा था।
लोकसभा चुनाव में भी बढ़ा भाजपा का प्रभाव
लोकसभा चुनावों में भी भाजपा का प्रदर्शन लगातार बदलता रहा। शुरुआती दौर में पार्टी सीमित सीटों तक सिमटी रही, लेकिन 2019 में उसने बड़ा उभार दिखाया।
1952: 2 सीटें
- 1991: 0 सीट, 11.66% वोट
- 1998: 1 सीट, 10.20% वोट
- 1999: 2 सीटें, 11.13% वोट
- 2009: 1 सीट, 6.14% वोट
- 2014: 2 सीटें, 17.02% वोट
- 2019: 18 सीटें, 40.64% वोट
- 2024: 12 सीटें, 38.73% वोट
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने खुद कोलकाता दक्षिण-पूर्व सीट से चुनाव जीता था, जबकि दुर्गा चरण बनर्जी ने मिदनापुर सीट से जीत दर्ज की थी।
क्षेत्रीय दलों के बीच भाजपा का विस्तार
राजनीतिक तस्वीर में एक बड़ा बदलाव यह भी माना जा रहा है कि कई क्षेत्रीय दल अब अपने-अपने राज्यों तक सीमित होते जा रहे हैं।
- राजद: बिहार तक सीमित प्रभाव
- जदयू: बिहार केंद्रित
- जेडीएस: कर्नाटक तक सीमित
- बीआरएस: तेलंगाना में कमजोर
- बीजद: ओडिशा में मजबूत
- बसपा: यूपी में गिरावट
- आम आदमी पार्टी: दिल्ली-पंजाब तक सीमित
- एनसीपी: विभाजन के बाद कमजोर
- शिरोमणि अकाली दल: पंजाब में गिरावट
- यूबीटी: महाराष्ट्र तक सीमित
- इनेलो: हरियाणा में कमजोर
- डीएमके: तमिलनाडु में हार
- तृणमूल कांग्रेस: बंगाल तक सीमित
- सीपीएम: केरल तक सीमित
निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक देश में 55 से 60 क्षेत्रीय दल हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ 25 से 28 दल ही कई राज्यों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बंगाल में भाजपा का उभार राष्ट्रीय राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।





