ताइवान की जटिल, जो चीन के संप्रभुता के दावे और उसकी वास्तविक स्वतंत्रता के बीच फंसा है। यह ‘वन चाइना पॉलिसी’ और चीन, अमेरिका तथा ताइवान के बीच संवेदनशील गतिशीलता को उजागर करता है, जो अंतरराष्ट्रीय संबंधों को खतरनाक मोड़ पर ले जा सकती है।
चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से बातचीत में साफ कहा है कि ताइवान का मुद्दा दोनों देशों के रिश्तों को ‘खतरनाक मोड़’ पर ले जा सकता है।
उन्होंने कहा कि ताइवान की आजादी और ताइवान जलडमरूमध्य में शांति ‘आग और पानी’ की तरह हैं, जो एक साथ नहीं रह सकते। इसके बाद एक बार फिर दुनिया भर में यह सवाल चर्चा में आ गया है कि आखिर ताइवान का असली दर्जा क्या है? क्या वह पहले से स्वतंत्र देश है या फिर चीन का हिस्सा?
दरअसल, ताइवान को लेकर चीन, अमेरिका और ताइवान तीनों की अलग-अलग सोच और दावे हैं। यही वजह है कि यह मुद्दा दशकों से अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सबसे संवेदनशील विवाद बना हुआ है।
ताइवान आज अपने चुने हुए राष्ट्रपति, सेना, पासपोर्ट, मुद्रा और अलग प्रशासन के साथ काम करता है, लेकिन अधिकांश देश उसे आधिकारिक रूप से स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर मान्यता नहीं देते। दूसरी ओर चीन उसे अपना हिस्सा मानता है और जरूरत पड़ने पर बल प्रयोग की चेतावनी भी देता रहा है।
ताइवान का इतिहास क्या है?
ताइवान का इतिहास काफी जटिल रहा है। पहले इस द्वीप को फारमोसा कहा जाता था। यहां हजारों वर्षों से स्थानीय आदिवासी समुदाय रहते थे। 1600 के दशक में कुछ समय तक डच और स्पेनिश शासकों ने यहां शासन किया।
इसके बाद 1684 में चीन के किंग राजवंश ने ताइवान को अपने फुजियान प्रांत का हिस्सा बनाया। हालांकि 1885 में इसे अलग चीनी प्रांत का दर्जा दिया गया। 1895 में जापान के साथ युद्ध हारने के बाद चीन ने ताइवान जापान को सौंप दिया। फिर द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद 1945 में ताइवान दोबारा रिपब्लिक ऑफ चाइना सरकार को मिला।
लेकिन 1949 में चीन में गृहयुद्ध के दौरान माओत्से तुंग की कम्युनिस्ट सेना ने जीत हासिल की। इसके बाद रिपब्लिक ऑफ चाइना की सरकार चीन छोड़कर ताइवान चली गई और वहीं अपनी राजधानी बना ली। दूसरी ओर माओ ने पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना यानी आज के चीन की स्थापना की। यहीं से चीन और ताइवान के बीच असली राजनीतिक विवाद शुरू हुआ।
चीन और ताइवान दोनों क्या दावा करते हैं?
चीन का कहना है कि ताइवान उसका अभिन्न हिस्सा है और एक दिन उसका ‘पुनर्एकीकरण’ जरूर होगा। बीजिंग खुद को पूरे चीन का एकमात्र वैध प्रतिनिधि मानता है। वहीं ताइवान की सरकार कहती है कि उसका प्रशासन पूरी तरह स्वतंत्र है और चीन का वहां कोई नियंत्रण नहीं है।
ताइवान का कहना है कि बीजिंग को उसके लोगों या सरकार की ओर से बोलने का कोई अधिकार नहीं है। ताइवान में लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव होते हैं और वहां के लोग अपने राष्ट्रपति और संसद चुनते हैं।
ताइवान की मौजूदा स्थिति को समझें:
- ताइवान की अपनी सेना है
- अलग पासपोर्ट और मुद्रा है
- अलग संविधान और सरकार है
- चीन का वहां कोई प्रशासनिक नियंत्रण नहीं है
- लेकिन अधिकांश देश उसे आधिकारिक स्वतंत्र देश नहीं मानते
संयुक्त राष्ट्र और दुनिया का रुख क्या है?
1971 तक ताइवान यानी रिपब्लिक ऑफ चाइना संयुक्त राष्ट्र में चीन की सीट रखता था। लेकिन बाद में संयुक्त राष्ट्र ने बीजिंग स्थित पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को चीन का आधिकारिक प्रतिनिधि मान लिया।
इसके बाद ज्यादातर देशों ने चीन के साथ संबंध बनाए और ताइवान से आधिकारिक दूरी बना ली। फिलहाल केवल 12 देश ही ताइवान के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध रखते हैं। हालांकि अमेरिका समेत कई पश्चिमी देशों के ताइवान के साथ अनौपचारिक लेकिन मजबूत संबंध हैं।
अधिकांश देशों में ताइवान के वास्तविक दूतावास जैसे कार्यालय भी मौजूद हैं। ताइवानी नागरिक अपने पासपोर्ट पर दुनिया के कई देशों की यात्रा कर सकते हैं।
अमेरिका की नीति क्या है?
अमेरिका ने 1979 में आधिकारिक रूप से ताइवान से संबंध खत्म कर चीन को मान्यता दी थी। लेकिन इसके साथ ही उसने ‘ताइवान रिलेशंस एक्ट’ बनाया, जिसके तहत अमेरिका ताइवान को अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी सहायता और हथियार दे सकता है।
अमेरिका ‘वन चाइना पॉलिसी’ का पालन करता है, लेकिन वह ताइवान की संप्रभुता पर स्पष्ट आधिकारिक रुख नहीं लेता। चीन लगातार अमेरिका से ताइवान को हथियार देने पर आपत्ति जताता रहा है।
अमेरिका की नीति के मुख्य बिंदु:
- चीन को आधिकारिक मान्यता
- ताइवान से अनौपचारिक लेकिन मजबूत संबंध
- ताइवान को रक्षा सहायता
- चीन के हमले की स्थिति में अप्रत्यक्ष समर्थन
क्या ताइवान पहले से स्वतंत्र देश है?
यही सबसे बड़ा सवाल है। तकनीकी रूप से देखें तो ताइवान एक स्वतंत्र देश की तरह काम करता है। वहां की सरकार पूरी तरह अलग है और चीन का वहां कोई नियंत्रण नहीं है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिकतर देश उसे औपचारिक रूप से स्वतंत्र राष्ट्र नहीं मानते, ताकि चीन के साथ उनके रिश्ते खराब न हों।
ताइवान की सरकार का कहना है कि ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ पहले से एक संप्रभु राज्य है और उसे अलग से आजादी घोषित करने की जरूरत नहीं है। ताइवान के मौजूदा राष्ट्रपति लाई चिंग-ते भी कई बार कह चुके हैं कि ताइवान पहले से स्वतंत्र है। हालांकि चीन उन्हें ‘अलगाववादी’ नेता कहता है।
क्या ताइवान अपना नाम बदल सकता है?
कुछ लोग चाहते हैं कि ताइवान खुद को आधिकारिक रूप से ‘रिपब्लिक ऑफ ताइवान’ घोषित करे। लेकिन ऐसा करना आसान नहीं है। इसके लिए संविधान में संशोधन करना होगा, संसद में भारी बहुमत चाहिए होगा और फिर जनमत संग्रह भी कराना पड़ेगा फिलहाल वहां की राजनीति में इतनी सहमति नहीं है। मुख्य विपक्षी पार्टी कुओमिनतांग इसका विरोध करती है।
चीन का सैन्य और कानूनी दबाव
चीन कई बार कह चुका है कि वह ताइवान को अपने नियंत्रण में लाने के लिए बल प्रयोग से भी पीछे नहीं हटेगा। 2005 में चीन ने ‘एंटी-सेसेशन लॉ’ बनाया था। इसके तहत अगर ताइवान औपचारिक रूप से अलग देश बनने की कोशिश करता है या शांतिपूर्ण समाधान की संभावना खत्म होती है, तो चीन सैन्य कार्रवाई कर सकता है। हालांकि इस कानून में कार्रवाई की स्पष्ट शर्तें नहीं बताई गई हैं।
क्यों खतरनाक बनता जा रहा है यह विवाद?
ताइवान दुनिया की सबसे अहम सेमीकंडक्टर और चिप निर्माण अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इसलिए यह केवल राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक और सामरिक मुद्दा भी है। अगर चीन और ताइवान के बीच संघर्ष बढ़ता है तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, व्यापार और तकनीकी उद्योग पर पड़ सकता है।
यही वजह है कि अमेरिका, जापान और पश्चिमी देश ताइवान पर चीन के बढ़ते दबाव को लेकर लगातार चिंता जता रहे हैं। फिलहाल ताइवान की अधिकांश जनता मौजूदा स्थिति बनाए रखना चाहती है। यानी न चीन के साथ विलय और न ही औपचारिक स्वतंत्रता की घोषणा। लेकिन चीन और अमेरिका के बीच बढ़ती तनातनी के कारण यह मुद्दा लगातार और संवेदनशील होता जा रहा है।





