वाराणसी: शहर वाराणसी के रेवड़ी तालाब क्षेत्र में अबुल हसन सोसाइटी की ओर से पांच दिवसीय मजलिस-ए-अज़ा का रौशन और रोशन कार्यक्रम आयोजित किया गया।
इन मजलिसों को मौलाना सैयद हैदर अब्बास रिज़वी ने संबोधित किया।
मौलाना ने सुरह अ’राफ़ की आयत नंबर 157 को विषय की शुरुआत बनाते हुए कहा कि इस्लामी कैलेंडर का तीसरा महीना शुरू हो चुका है जो कि बहार (वसंत) की शुरुआत है। शिया-सुन्नी सभी के अनुसार इसी महीने में सरवरे कायनात हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही व सल्लम का पैदाइशी दिन है — वो पैग़ंबर जिनकी आज मुसलमान ही नहीं बल्कि ग़ैर-मुस्लिम भी अज़मत के क़ायल हैं। माईकल एच हार्ट ने अपनी किताब में बाकायदा एक ईसाई होते हुए भी हमारे नबी की महानता को स्वीकार किया है।
मौलाना हैदर ने पैग़ंबर ए आज़म की सुन्नत और सीरत पर विस्तार से रौशनी डाली। साथ ही उन्होंने कहा कि अगर कर्बला न होती, तो नबी की सुन्नत भी महफूज़ न रहती। आज हर वह मुसलमान जो अपने आप को सुन्नत-ए-नबवी का अनुयायी कहता है, उसे कर्बला की याद ज़रूर मनानी चाहिए।
मौलाना सैयद हैदर अब्बास रिज़वी ने फर्ज़शناس मोमिनों को संबोधित करते हुए तौक़ीद (ज़ोर) दिया कि आने वाले साल रसूल-ए-अकरम की पैदाइश के 1500 साल पूरे हो रहे हैं। इसके लिए अभी से एक मुकम्मल योजना बनानी होगी। अपने शहर के प्रमुख उलेमाओं की रहनुमाई में सेमिनार वगैरह के आयोजन पर ज़रूर काम किया जाए।
मौलाना सैयद हैदर अब्बास रिज़वी ने इश्क़ के सफर से लौटे ज़ायरीनों की मौजूदगी में ज़ियारत-ए-कर्बला की अहमियत पर भी बयान जारी रखा और हदीस-ए-नबवी की रौशनी में कहा कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने जब अपना सब कुछ राहे ख़ुदा में क़ुर्बान कर दिया, तो अब अगर कोई उनकी मोहब्बत में ज़ियारत-ए-कर्बला का शरफ़ हासिल करता है, तो यक़ीनन उसे जन्नत में पैग़ंबर और उनके अहलेबैत अ.स. की हमनशीनी नसीब होगी।
ज़ियारत-ए-कर्बला की अहमियत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि मरहूम इब्न क़ौलूया की किताब “कामिलुज़ ज़ियारात” 755 पन्नों पर मुश्तमिल है, जिसमें 500 पन्ने सिर्फ इमाम हुसैन अ.स. से मख़सूस हैं। इस किताब के 108 बाब में से 80 बाब सिर्फ सैय्यदुश्शुहदा इमाम हुसैन अ.स. के लिए मख़सूस हैं, जो इमाम की अज़मत और ज़ियारत-ए-कर्बला की फज़ीलत को समझने के लिए काफ़ी हैं।
ख़तीब-ए-मजलिस मौलाना सैयद हैदर अब्बास रिज़वी ने अपने ख़ास अंदाज़ में कहा कि आप हर साल जाइए हज और ज़ियारत पर, यक़ीनन बहुत अच्छा अमल है। लेकिन साथ ही उन लोगों का भी ख्याल रखिए जो माली तंगी की वजह से इन मुक़द्दस और रूहानी सफरों से महरूम रह जाते हैं। नबी-ए-अज़म ने फ़रमाया है कि — “जो यतीम की परवरिश करे, जो नंगे को कपड़ा पहनाए, जो भूखे को खाना खिलाए, जो कुँवारे की शादी कराए या किसी के हज व ज़ियारत के सफर को आसान बनाए — वह क़यामत में अंबिया किराम के साथ महशूर होगा।”
मजलिस का इख़्तताम मौलाना ने तज़किरा-ए-मसाइब (इमाम हुसैन अ.स. और अहलेबैत के दुख) से किया, जिसे सुनकर अज़ादारों में सोग और ग़म का माहौल छा गया।
काबिले-ज़िक्र है कि मजलिसों की शुरुआत तिलावत-ए-कलाम-ए-पाक से हुई, जिसे क़ारी इमाम अली और मोहम्मद हसन ने अंजाम दिया।
सोज़ख़्वानी की जिम्मेदारी जनाब क़ासिम अली और उनके हमनवाओं ने निभाई।
नौहा ख़्वानी अल्हाज इजाज़ हुसैन, वक़ार हुसैन और ज़ाएर हुसैन ने की।
अबुल हसन सोसाइटी इन मजलिसों में शरीक होने वाले तमाम मर्दों और औरतों, बच्चों और बुज़ुर्गों, नौजवानों और ख़तीब-ए-मजलिस का दिल से शुक्रिया अदा करती है।