खराब जीवनशैली के कारण उच्च रक्तचाप एक गंभीर समस्या बन गया है, जिसके लक्षण अक्सर देर से पता चलते हैं। यह हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसी बीमारियों का मुख्य कारण है। नियमित जांच और जीवनशैली में सुधार से इस साइलेंट किलर से बचा जा सकता है।
अगर खानपान को लेकर आप सचेत नहीं हैं और आपको इस बात से भी फर्क नहीं पड़ता कि भोजन में कितना नमक या चीनी है या फिर वह कितना तला-भुना है, तो आप बीमारी की वेटिंग लिस्ट का हिस्सा बन चुके हैं। कहीं दिनभर बैठे रहने, शरीर को हर समय आराम में रखने की आदत भी बना चुके हैं, तो तय मानिये बिना किसी चेतावनी के बीमारी कभी भी दस्तक दे सकती है।
दरअसल, वजन बढ़ने, खराब दिनचर्या, तंबाकू, अल्कोहल जैसी आदतें चुपके से पहले ब्लड प्रेशर की रेंज को बढ़ा देती हैं और फिर हार्टअटैक, स्ट्रोक, पैरालिसिस जैसी बीमारियां घेरने के लिए तैयार खड़ी हो जाती हैं। ब्लड प्रेशर जब अपनी तय सीमारेखा (120/80) को पार करके लगातार ऊपर की रेंज में बना रहता है, तो उसे हाइपरटेंशन कहते हैं।
दुनियाभर के 1.4 अरब वयस्क इस समस्या की गिरफ्त में आ चुके हैं और यही लोग हार्ट अटैक और स्ट्रोक के संभावित शिकार भी हैं। आज बड़ी संख्या में मौतों के पीछे हाइपरटेंशन, डायबिटीज जैसी गैर संचारी बीमारियां सबसे बड़ा कारण बन रही हैं, जिसे आप आहार-व्यवहार में सामान्य परिवर्तन से भी रोक सकते हैं।
चुपके से घेरता है हाइपरटेंशन
ज्यादातर लोगों में हाइपरटेंशन का कोई स्पष्ट लक्षण महसूस ही नहीं होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का अनुमान है कि हाइपरटेंशन वाले 46 प्रतिशत वयस्कों को इसके बारे में लंबे समय तक पता ही नहीं चलता, जिससे वे शरीर में पनप रही बीमारी से बेखबर बने रहते हैं। हालांकि, उच्च रक्तचाप अधिक होने की स्थिति में सिरदर्द होने, धुंधला दिखने, सीने में दर्द जैसी समस्याएं होती हैं। ब्लड प्रेशर तय सीमा को पार न करें या नई बीमारियों का कारण न बने, इसके लिए सबसे जरूरी है कि सेहत की नियमित अंतराल पर जांच कराई जाए।
अगर हाइपरटेंशन का समय रहते उपचार नहीं किया जाता, तो आगे चलकर किडनी, हार्ट जैसे अनेक अंगों के लिए यह मुसीबत बन सकता है। सर गंगाराम अस्पताल, नई दिल्ली के कार्डियोलाजिस्ट डॉ. अरुण मोहंती के अनुसार, हाइपरटेंशन की समस्या अब युवाओं को भी तेजी से गिरफ्त में ले रही है। इसलिए कम उम्र में ही बीपी को लेकर सतर्कता बढ़ाने की जरूरत है।
व्यवस्थित करनी होगी जीवनशैली
पहले ग्रामीण इलाकों में यह समस्या बहुत कम देखने में आती थी, लेकिन अब शहरी और ग्रामीण दोनों ही आबादी इसकी चपेट में आ रही हैं। इसका प्रमुख कारण है अव्यवस्थित होती जीवनशैली। भारत समेत लगभग सभी दक्षिण एशियाई देशों में शिथिल जीवनशैली, मोटापा खासकर पेट के आसपास जमा फैट, तंबाकू, धूमपान, कार्बोहाइड्रेट की अधिकता वाला भोजन, स्लीप एप्निया जैसे कारण ऐसे रोगों का जोखिम बढ़ा रहे हैं।
आमतौर पर, खर्राटे लेने की बीमारी को नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि यह सेहत के लिए खराब होने का शुरुआती संकेत हो सकता है। डा. मोहंती की मानें तो किसी एथलीट या शारीरिक तौर पर सक्रिय रहने वाले व्यक्ति में खर्राटे की समस्या अक्सर देखने में नहीं आती। जो लोग चलते-फिरते या व्यायाम नहीं करते हैं या जिन्हें मोटापा, डायबिटीज जैसी समस्या है, उन्हें स्लीप एप्निया होने की आशंका अधिक रहती है। हाइपरटेंशन होने के पीछे भी यह एक बड़ा कारण होता है।
सेहत की जांच है जरूरी
किसी भी बीमारी से बचाव के लिए स्क्रीनिंग बहुत आवश्यक है। एम्स द्वारा काफी पहले एक स्कूल सर्वे हुआ था, जिसमें पाया गया था 30 प्रतिशत स्कूली बच्चों में मोटापे और हाइपरटेंशन की समस्या बढ़ रही है। इसे लेकर खानपान और दिनचर्या में सुधार की तत्काल आवश्यकता है। हाइपरटेंशन दो तरह का होता है। प्राइमरी हाइपरटेंशन, जिसका कारण नहीं पता होता है। सेकंडरी हाइपरटेंशन, जो किडनी, आर्टरी, वैस्कुलाइटिस आदि बीमारियों के कारण होता है। फिलहाल, मुख्य रूप से यह प्राइमरी हाइपरटेंशन से बचाव पर फोकस बढ़ाने की जरूरत है। अगर पहली बार में बीपी की माप सामान्य से अधिक आ रही है तो उसके पीछे के कारण को जानना आवश्यक है, जैसे मोटापा या स्लीप एप्निया है, यह पता करना चाहिए। इसके बाद दिनचर्या और खानपान में सुधार से शुरुआत करनी चाहिए।
ऐसे लक्षणों पर रखें नजर
चूंकि, हाइ ब्लड प्रेशर में ज्यादातर लोगों को स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते। इसे चेक करके ही आप बीपी की सही स्थिति का पता लगा सकते हैं न कि लक्षणों का इंतजार करके। अधिक ब्लड प्रेशर होने पर ये लक्षण महसूस हो सकते हैं:
- तेज सिरदर्द
- सीने में दर्द
- चक्कर आना
- सांस लेने में दिक्कत
- जी मिचलाना
- उल्टी होना
- धुंधला दिखाई देना या आंखों की रोशनी में कोई और बदलाव
- घबराहट
- उलझन
- कानों में भिनभिनाहट की आवाज
- नाक से खून आना
- दिल की धड़कन का अनियमित होना
- अगर कोई भी लक्षण महसूस हो रहा है, तो तुरंत डाक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
जीवनशैली में कैसे करें सुधार
- स्वस्थ, कम नमक वाले भोजन को प्राथमिकता दें।
- वजन को नियंत्रण में रखने का प्रयास करें।
- दिनभर शारीरिक रूप से सक्रिय रहे।
- तंबाकू, धूमपान और अल्कोहल से दूरी बनाएं।
- अधिक बीपी होने पर निर्धारित दवाएं लेते रहें।
क्या है बचाव का सही तरीका
क्या करें:
- भोजन में मौसमी फलों और सब्जियों का मात्रा बढ़ाएं।
- कम बैठें, शारीरिक रूप से कुछ करते रहें। जैसे- चलना, दौड़ना, तैरना, वजन उठाना जैसे ताकत बढ़ाने वाले व्यायाम करें।
- सप्ताह में कम से कम 150 मिनट तक मध्यम-तीव्रता वाली एरोबिक गतिविधि करें या 75 मिनट तक तेज एरोबिक गतिविधि करें।
- सप्ताह में दो दिन या उससे अधिक स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और तीव्रता वाले व्यायाम करें।
- अगर वजन अधिक है, तो उससे प्रतिदिन की सक्रियता के साथ कम करना शुरू करें।
- डाक्टर द्वारा बताई गई दवाओं का नियमित रूप से सेवन करें।
क्या न करें:
- बहुत अधिक नमक वाले भोजन
- सैचुरेटेड या ट्रांस फैट वाले खाद्य पदार्थ
- धूमपान या तंबाकू, अल्कोहल का सेवन
- दवा लेने में लापरवाही
जोखिम को कम करने के उपाय
- तनाव को कम करें और उसे नियंत्रित रखें।
- नियमित रूप से अपना ब्लड प्रेशर जांचते रहें।
- हाई ब्लड प्रेशर का सही इलाज कराएं।
- प्रदूषित हवा के संपर्क में आने से बचें।
बीपी सही रखने के लिए सुधारें जीवनशैली
एक गलत धारणा बन गई है कि नमक खाने से हाइपरटेंशन होता है, जबकि नमक का सामान्य रूप से सेवन गलत नहीं है। अधिक मात्रा में नमक के सेवन से ही हाइपरटेंशन की समस्या होती है। इसी तरह मिथ है कि सेंधा नमक, काला नमक का सेवन करना चाहिए। हमें समझना होगा कि सामान्य नमक के सेवन से कोई समस्या नहीं होती। हाइपरटेंशन समेत जितने भी क्रोनिक बीमारियां हैं, शुगर, कोलेस्ट्राल आदि तभी उभरती हैं, जब शरीर के किसी आर्गन की क्षमता प्रभावित हो रही होती है।
अंग के खराब होने तक यह साइलेंट बनी रहती हैं और एक अंग से दूसरे अंग को खराब कर रही होती हैं, इसलिए समय पर स्वास्थ्य की जांच बहुत महत्वपूर्ण है। पहले बीपी के 150 से 160 पर होने पर इसे हाइपरटेंशन की श्रेणी में रखा जाता था। वह कटआफ अब 130 पर आ गया है। बीपी 140 पर भी रहता है उसे हाइपरटेंशन मान लिया जाता है। हाइपरटेंशन से बचाव के लिए जीवनशैली में बदलाव जरूरी है। इसमें सुधार नहीं होने पर दवा की जरूरत पड़ती है। ऐसे लोगों को वजन कम करने, एक्सरसाइज प्रोग्राम में शामिल करने जैसे उपायों पर फोकस करना चाहिए।
फिजिकल एक्टिविटी को बढ़ाना चाहिए, लो कार्बोहाइड्रेट भोजन लेना चाहिए। दो-तीन महीने में बीपी की निगरानी करनी चाहिए। अगर जीवनशैली में सुधार करने या वजन घटाने के बावजूद बीपी की समस्या (130-80 से ऊपर रहती है) बनी हुई है तो मेडिकल थेरेपी की जरूरत पड़ती है। आजकल बहुत सारी दवाइयां आ गई हैं जो बीपी में काफी प्रभावी हैं। इससे आने वाले समय में हार्टअटैक, स्ट्रोक, किडनी डैमेज होने या पैरालिसिस की आशंका कम होती है।





