लखनऊ अपनी भाषा, खानपान और इमारतों के लिए एक समृद्ध विरासत वाला शहर है। यूनेस्को ने इसे ‘सिटी ऑफ गैस्ट्रोनॉमी’ का दर्जा दिया है, जहाँ चाट, बाकरखानी, शीरमाल और कबाब जैसे व्यंजन प्रसिद्ध हैं।
लखनऊ। जुबां भी हमारी पहचान है। हम जितने अदब से आदाब बोलते हैं, उतना ही अपनापन “पहले आप” में लुटाते हैं। ये हमारी लखनवी संस्कृति की पहचान ही नहीं विरासत भी है। हमारे शहर की इमारतें, परिधान, कला और संस्कृति भी धरोहर हैं, जो दिन-प्रतिदिन समृद्ध होती जा रही है।
लखनऊ में स्वाद का भंडार है। यहां के खाने जैसा जायका कहीं और नहीं मिलता। यूनेस्को ने गत वर्ष नवंबर में इस शहर को “सिटी आफ गैस्ट्रोनामी” से सम्मानित कर इस बात को स्वीकार किया है। यहां चाट-टिक्की का अलग ही जायका होता है। फिल्म जगत का कोई भी कलाकार हो या फिर अन्य कोई मेहमान, वो लखनऊ आता है तो चाट और अन्य व्यंजनों का स्वाद अवश्य लेता है।
गत नवंबर में अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा व अभिनेत्री जाह्ववी कपूर आए तो चाट का जायका लेने से स्वयं को रोक न सके। पुराने शहर में दूध और मैदे से बनी बाकरखानी रोटी शीरमाल के रूप में प्रसिद्ध है तो कबाब, नहारी-कुलचा, मक्खन मलाई और बिरयानी के दीवाने देश-दुनियाभर के लोग हैं।
इतिहासकार पद्मश्री डा. योगेश प्रवीन ने अपनी किताब ‘आपका लखनऊ’ में लिखा है कि दूध और मैदे की बनी बाकरखानी रोटी को यहां के महमूद मियां ने शीरमाल की सूरत दी थी। ईरान और अफगानिस्तान का मशहूर कुलचा भी लखनऊ में आकर अलग स्वाद पा गया।
इसलिए मनाते दिवस
विश्व धरोहर दिवस वर्ष 1982 में 18 अप्रैल को मनाने की घोषणा की गई थी। वर्ष 1983 में यूनेस्को महासभा ने इसे पूरी तरह से मान्यता दे दी।
हर इमारत की अलग कहानी…
लखनऊ में अनेक इमारते हैं। सबकी अलग कहानी है। यहां की नक्काशी का काम विख्यात है। छतों पर सफेद रंग की नक्काशी संगमरमर सी लगती है, लेकिन वह होती चूने की है। यह शंख और सीप के पाउडर को चूने में मिलाकर बनाई जाती है। बेल बूटों के अलावा चिकनकारी के पैटर्न भी दीवारों पर मिल जाते हैं।
नवाब गाजीउद्दीन हैदर के शासन काल में कोठी दर्शन विलास का निर्माण प्रारंभ कराया गया था। राज्य पुरातत्व निदेशालय के अभिलेखों के अनुसार, 1832 में नवाब नासिरुद्दीन हैदर के समय में यह कोठी बनकर तैयार हुई थी। छतर मंजिल इलाके में बादशाह नासिरुद्दीन हैदर ने प्रियतमा कुदसिया महल के लिए यह महल बनवाया था।
19वीं सदी के चौथे दशक में बादशाह नसीरुद्दीन हैदर ने कोठी गुलिस्ताने इरम का निर्माण कराया था। लाल बारादरी और छोटी छतर मंजिल के मध्य बनवाए गए इस महल का कुछ भाग शेष रह गया है। इस भवन पर यूरोपियन वास्तुकला का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। चौक में बड़ा इमामबाड़ा, छोटा इमामबाड़ा की विशिष्ट पहचान है तो कैसरबाग में छतर मंजिल भवन इंडो-इटालियन स्थापत्य का बेहतरीन उदाहरण है।





