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क्या साल 2064 तक घटकर आधी रह जाएगी दुनिया की आबादी? वैज्ञानिकों ने बताए चार बड़े खतरे

एक नई रिसर्च के अनुसार, जलवायु परिवर्तन, महामारी और युद्ध जैसे गंभीर वैश्विक संकटों के एक साथ होने पर 2064 तक दुनिया की आबादी आधी हो सकती है।

दुनिया के सामने मंडरा रहे जलवायु परिवर्तन, महामारी और युद्ध जैसे खतरों को लेकर एक नई इंटरनेशनल रिसर्च ने बेहद चौंकाने वाला दावा किया है। रिसर्च में अनुमान लगाया गया है कि अगर यह वैश्विक संकट एक साथ गंभीर रूप लेते हैं, तो वर्ष 2064 तक दुनिया की मौजूदा आबादी घटकर लगभग आधी रह सकती है।

हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं, बल्कि सबसे खराब परिस्थितियों के आधार पर किया गया एक संभावित वैज्ञानिक आकलन है।

यह रिसर्च ‘ग्लोबल पॉपुलेशन क्राइसिस सीनारियोज प्रेडिक्टेड बाय ए जनरल नॉनलाइनियर डायनेमिकल मॉडल’ से प्रकाशित हुआ है। यह रिसर्च संयुक्त रूप से दो प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ मिलान के प्रोफेसर मैटेओ जाकोने और ब्रिटेन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के दिवंगत प्रोफेसर कोन्स्टेंटिन ट्राचेन्को के द्वारा की गई है।

किन वजहों से घट सकती है आबादी?

रिसर्च में चार प्रमुख खतरों की पहचान की गई है-

  • जलवायु परिवर्तन, यह खाद्य उत्पादन और कृषि व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
  • कोविड-19 जैसी या उससे भी गंभीर महामारी।
  • बड़े युद्ध या परमाणु संघर्ष, जिनसे भारी जनहानि और बुनियादी ढांचे का विनाश हो सकता है।
  • पानी, भोजन और ऊर्जा जैसे संसाधनों की बढ़ती कमी।

जनसंख्या विस्फोट की ओर नहीं बढ़ रही दुनिया

रिसर्च के मुताबिक, 1970 के बाद दुनिया में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार कम हुई है और फिलहाल दुनिया किसी जनसंख्या विस्फोट की ओर नहीं बढ़ रही है। लेकिन अगर पृथ्वी पर जीने लायक दशाएं अचानक घटती हैं तो जनसंख्या में तेज गिरावट देखने को मिल सकती है। सबसे खराब स्थिति में 2064 तक होने की संभावना है, जब वैश्विक आबादी लगभग आधी हो सकती है।

12 हजार साल के आंकड़ों का किया गया अध्ययन
शोधकर्ताओं ने इस रिसर्च में ट्राचेन्को-जाकोने नाम का नया गणितीय मॉडल इस्तेमाल किया। इस मॉडल को पहले कांच और अन्य ठोस पदार्थों के व्यवहार को समझने के लिए बनाया गया था, लेकिन वैज्ञानिकों ने इसे मानव आबादी पर भी लागू किया।

इसके लिए पिछले करीब 12 हजार वर्षों के जनसंख्या का अध्ययन किया गया। जिसमें अलग-अलग ऐतिहासिक दौरों से इसकी तुलना की गई। इसके बाद जलवायु परिवर्तन, महामारी, युद्ध तथा भोजन, पानी और ऊर्जा की कमी जैसी वैश्विक चुनौतियों को जोड़कर कई संभावित स्थितियों का आकलन किया गया।

इस रिसर्च के आधार पर शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि 2064 तक जनसंख्या आधी होने का दावा केवल एक गणितीय आकलन है, जो सबसे खराब परिस्थितियों पर आधारित है।

यूएन (UN) की रिपोर्ट और नई रिसर्च में क्या अंतर है?

संयुक्त राष्ट्र (UN) की जनसंख्या रिपोर्ट इस नई रिसर्च से अलग तस्वीर पेश करती है। यूएन के अनुमान के अनुसार, साल 2050 तक दुनिया की आबादी करीब 9.7 अरब और इस सदी के अंत तक लगभग 11 अरब तक पहुंच सकती है। हालांकि कई देशों में जन्मदर घट रही है, लेकिन भारत, नाइजीरिया और पाकिस्तान जैसे देशों में जनसंख्या बढ़ती रहेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों आकलनों में कोई विरोधाभास नहीं है, क्योंकि यूएन सामान्य परिस्थितियों को ध्यान में रखकर जनसंख्या वृद्धि का अनुमान लगाता है, जबकि यह नई रिसर्च यह समझने की कोशिश करती है कि यदि दुनिया को बड़े पर्यावरणीय या सामाजिक संकटों का सामना करना पड़े, तो उसका असर कितना गंभीर हो सकता है।

यानी कुल मिलाकर दुनिया की आबादी आधी होने का कोई निश्चित संकेत नहीं है, लेकिन यह रिसर्च एक गंभीर चेतावनी जरूर देती है कि जलवायु संकट, महामारी और संसाधनों पर बढ़ता दबाव भविष्य में इंसानों के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन सकते हैं।

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