स्थानीय इमामबाड़े में आयोजित मजलिस को संबोधित करते हुए मौलाना सलमान अली नजफ़ी ने “रिश्ता-ए-उखुव्वत (भाईचारे का संबंध)” विषय पर एक विचारोत्तेजक लेख प्रस्तुत किया। उन्होंने हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ के इस कथन “ऐ अली! तुम दुनिया और आख़िरत में मेरे भाई हो” को आधार बनाते हुए कहा कि इस्लाम ने रिश्तों की हिफाज़त, प्रेम, त्याग और आपसी सम्मान की शिक्षा दी है।
उन्होंने कहा कि वाक़िआ-ए-कर्बला रिश्तों की महानता और उनकी पाबंदी का बेमिसाल नमूना है। इमाम हुसैन (अ.) ने अपने अहले बैत, भाइयों, भतीजों, बेटों और साथियों के साथ वफ़ादारी, त्याग और भाईचारे की ऐसी मिसाल पेश की, जो क़यामत तक इंसानियत के लिए मार्गदर्शक बनी रहेगी। हज़रत अब्बास (अ.) की वफ़ादारी, हज़रत अली अकबर (अ.) की आज्ञाकारिता तथा अहले बैत (अ.) की कुर्बानियाँ इस सच्चाई को उजागर करती हैं कि इस्लाम में रिश्तों का सम्मान केवल रक्त संबंधों तक सीमित नहीं, बल्कि सत्य, निष्ठा और बलिदान से भी जुड़ा हुआ है।
मौलाना ने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि हम कर्बला के संदेश को अपनाते हुए अपने पारिवारिक और सामाजिक संबंधों को प्रेम, धैर्य, क्षमा और सदाचार के माध्यम से मजबूत बनाएं, क्योंकि मजबूत रिश्ते ही एक सभ्य, आदर्श और शांतिपूर्ण समाज की नींव होते हैं।





