जब आप पहले से ही लोन चुका रहे हों, तब नया लोन लेना संभव है, लेकिन बैंक आपकी आय और मौजूदा देनदारियों का मूल्यांकन करते हैं। बैंक मुख्य रूप से आपके FOIR (फिक्स्ड ऑब्लिगेशन टू इनकम रेश्यो) को देखते हैं, जो यह तय करता है कि आप नया लोन लेने के योग्य हैं या नहीं।
जीवन में कभी-कभार ऐसा मौका आता है कि हमें लोन लेना पड़ता है। उससे भी बुरी स्थिति तब आती है, जब एक लोन के चलते-चलते हमें नया लोन लेना पड़ता है। पर क्या ये पॉसिबल है कि एक लोन के बावजूद हमें नया लोन मिल जाए? इसका आसान जवाब ‘हां’ है। मगर बैंक आपको ऐसे ही नया लोन नहीं देगा। क्या होता है पूरा मामला आइए समझते हैं।
क्या देखता है बैंक?
जब बैंक या NBFC (नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी) आपकी लोन एप्लीकेशन का मूल्यांकन करते हैं, तो सैलरी सिर्फ सिर्फ एक शुरुआती पॉइंट होता है। असल में जो चीज मायने रखती है, वह यह है कि अपनी मौजूदा देनदारियों को चुकाने के बाद आपके पास कितना पैसा बचता है जानकार बताते हैं कि लोन देने वाले आपकी कुल मासिक आय देखते हैं और उसमें से आपकी सभी मौजूदा EMI—होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड—घटा देते हैं। जो बचता है, वही आपकी नए लोन के लिए उपलब्ध आय होती है।
क्या चाहता है बैंक?
सैलरी में से बची हुई रकम इस बात का आधार बनती है कि आप नया लोन ले सकते हैं या नहीं। असल में बैंक आम तौर पर यह चाहता है कि आपकी कुल मासिक देनदारियां (जिस लोन के लिए आपने आवेदन किया है उस सहित) आपकी कुल आय के 50-60% से अधिक न हों।
बैंक इस बात को लेकर आश्वस्त होना चाहता है कि आप मौजूदा लोन पर बिना किसी डिफॉल्ट के नए लोन की किस्तें चुका सकें। वह उधार लेने वालों को यह भी सलाह देते हैं कि वे अपनी सभी EMI के बारे में सच बताएं, क्योंकि अपनी देनदारियों को छिपाने से लोन रिजेक्ट हो सकता है या कानूनी दिक्कतें भी खड़ी हो सकती हैं।
FOIR रेशियो से चेक होती है एलिजिबिलिटी
बैंक FOIR (फिक्स्ड ऑब्लिगेशन टू इनकम रेश्यो) कैलकुलेट करता है। इससे आपकी इनकम का कितना हिस्सा पहले से ही EMI में जा रहा है, ये पता लगता है। नया लोन मिल पाएगा या नहीं, यह तय करने में इसकी अहम भूमिका होती है।
एक अच्छा FOIR 50% से कम होना चाहिए। मान लीजिए महीने में ₹50000 कमाते हैं और पहले से ही EMI के तौर पर ₹20,000 चुका रहे हैं, तो आपका FOIR 40% है, जिसे एक अच्छा स्तर माना जाएगा।
लेकिन अगर कोई नया लोन लेने से आपकी कुल EMI बढ़कर ₹32,500 हो जाती है, तो आपका FOIR बढ़कर 65% हो जाएगा। इस रेशियो को लोन देने वाले अच्छा नहीं मानेंगे और आपका आवेदन रिजेक्ट हो जा सकता है।
NBFCs लोन दे सकती हैं, मगर अधिक कॉस्ट पर
NBFCs अधिक FOIR पर भी लोन दे सकती हैं। वे 60–65% FOIR पर भी नया लोन दे सकती हैं। मगर इसके पीछे हाई कॉस्ट होती है। यानी आपको ऊंची ब्याज दर पर लोन मिलेगा। इसलिए अगर आप ऐसी सिचुएशन में कभी किसी NBFC से लोन लें तो फाइनेंशियल कैलकुलेशन जरूर कर लें।
क्रेडिट स्कोर/CIBIL से पड़ता है फर्क?
जानकार बताते हैं कि एक अच्छा क्रेडिट स्कोर जरूरी है, लेकिन यह आपके EMI के बोझ को कम नहीं कर पाएगा। 750 या उससे अधिक का क्रेडिट स्कोर लोन मंजूर होने की संभावना और ब्याज दरों को बेहतर बनाता है, लेकिन नए लोन की रकम FOIR और चुकाने की क्षमता से ही तय होती है।
कर्ज देने वालों की नजर में, आपकी मौजूदा EMI असल में आपका फाइनेंशियल रिपोर्ट कार्ड होती हैं। आपकी ऊंची इनकम आपके लिए दरवाजा खोल सकती है और आपका क्रेडिट स्कोर आपके मामले को मजबूत बना सकता है, लेकिन आखिर में आपकी मौजूदा देनदारियां ही यह तय करती हैं कि आप और कितना कर्ज ले सकते हैं।





