वक़ार रिज़वी

गोरखपुर ऐसा अभेद क़िला समझा जाता था जहां पिछले 30 सालों से मठ का क़ब्ज़ा था और मठ से यह क़ब्ज़ा वापस लेने की शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी लेकिन इस अनहोनी को भी अवाम की एकजुटता ने होनी में बदल दिया। यह जीत किसी गंठबंधन से ज़्यादा अवाम के एकुजट होने की है, वह अवाम जिसने पिछले दो इलेक्शन में देख लिया कि अगर हम मुन्तशिर रहेंगें तो मुक़ालिफ़ मज़बूत होगा और अगर हम मुत्तहिद होंगें तो मुक़ालिफ़ कमज़ोर होगा, इसलिये अगर तमाम छोटी बड़ी पार्टियों का इस इलेक्शन में गठबंधन न भी हुआ होता तो भी नतीजे यही आते इसका सबूत दोनों जगह कांग्रेस के उम्मीदवारों की ज़मानत का ज़ब्त होना है। इन इलेक्शन में भाजपा, सपा के साथ तीसरी बड़ी पार्टी कांग्रेस भी चुनाव लड़ रही थी और बड़े ज़ोर ओ शोर से लड़ रही थी उसे शायद यह ग़लतफ़हमी थी कि अगर संसदीय चुनाव होंगें तो अवाम केन्द्र के लिये हमारे साथ ही जायेगी और बसपा का वोट उन्हें मिलेगा और अल्पसंख्यक वोट को तो वह पूरी तरह से अपना मान ही चुके थे, लेकिन गोरखपुर और फूलपुर संसदीय चुनाव में जनता ने उसके साथ जाने का निर्णय लिया जो प्रदेश में अपना वजूद रखती है जिसकी प्रदेश में लीडरशिप है जिसका कैडर है जिसके कार्यकर्ता सक्रिय हैं नाकि कांग्रेस की तरह निष्क्रीय। यह एक तर्जुर्बा था, ज़रूरी नहीं कि 2019 में सब मिलकर लड़ें क्योंकि बक़ौल तेजस्वी यादव ई.डी. और सी.बी.आई अब अपना काम और तेज़ी से करेंगी तब बसपा और सपा को एकसाथ आना हो सकता है अगर वाक़ई मुश्किल हो जाये और कांग्रेस भी अपनी ग़लतफ़हमी से उबर न पाये, ऐसे हालात में अवाम को ख़ुद ही फ़ैसला करना होगा कि वह एकसाथ किसी एक के साथ जायें या कुछ इधर कुछ उधर कुछ इनके साथ कुछ उनके साथ जाकर सूखें पत्तों की तरह बिखर जायें और अपने वजूद को ख़त्म कर लें।
यह किसी एक धर्म, एक समाज या एक दल के एकजुट होने की बात नहीं है बल्कि उस एक सोच के एकजुट होने का असर है जो आज भी सभी धर्मो के मानने वालों में मौजूद है, वह नहीं चाहते कि समाज को धर्म की बुनियाद पर बांटा जाये क्योंकि उन्हें अच्छी तरह से मालूम है कि किसी मुसलमान की ईद उसके तमाम हिन्दु दोस्तों और हिन्दु पड़ोसियों के बिना मुमकिन नहीं और ऐसे ही किसी हिन्दु की होली उसके मुसलमान दोस्तों और उसके मुस्लिम पड़ोसियों के बिना फीकी है। ऐसे में अख़बार की यह सुख़ियां कि ‘‘मैं हिन्दु हूं ईद नहीं मनाता’’ उन्हें शायद हज़म नहीं होती क्योंकि उन्हें हिन्दु होने पर तो गर्व है लेकिन किसी दूसरे मज़हब से घृणां या उपहास उड़ाने की सोंच से वह अभी कोसों दूर हैं।
पिछले नगर निगम के चुनाव के बाद सभी धर्मों के तमाम बुद्धजीवियों नें लगातार बैठकें और सेमिनार कर लोगों में बेदारी पैदा करने की कोशिश की कि उनकी कामयाबी उनके मुत्तहिद होने में ही है नाकि मुन्तशिर रहने में। इसका असर भी हुआ लेकिन यह शुरूआत है मंज़िल अभी बहुत दूर है। 2019 होते होते हमीं में से कुछ ऐसे निकलेंगें जो दूसरे मज़हब वालों को बुरा भला कहेंगें, हमें मुन्तशिर करने की कोशिश करेंगें जिससे मुक़ालिफ़ न चाहते हुये भी मुत्तहिद हो जायेगा।
यह लड़ाई किसी एक फ़िरक़े, किसी एक जमाअत, किसी एक धर्म की नहीं बल्कि उनसब की है जो हिन्दुस्तान में नफ़रत नहीं मोहब्बत से रहना चाहते हैं जो ईद और होली एक दूसरे के साथ मनाना चाहते हैं, जो एकसाथ मिलकर हिन्दुस्तान को हर रोज़ तरक़्क़ी की नई उचाइंयों पर ले जाना चाहते हैं जो यह चाहते हैं कि हमारी आस्था हमारी निजी सम्पत्ति रहे इसे किसी दूसरे पर थोपना तो दूर हम इसे एक दूसरे से बांट भी न सकें, तो फिर आस्था के नाम पर दिन भर चैनल पर बहस, आस्था के नाम पर कोर्ट में बहस, आस्था के नाम पर एक दूसरे को एक दूसरे के ख़िलाफ़ बरग़लाना और आस्था के नाम पर चुनाव ? शायद अब नहीं। वह इसलिये कि गोरखुपुर जहां 30 साल से एक मठ का क़ब्ज़ा था जब भाजपा की प्रदेश में लगभग 10 से कम सीटें रहीं तो भी गोरखपुर की सीट भाजपा के पास ही रही। यह सीट भाजपा तब हारी जब उस सीट पर 5 बार सासंद रहनें वाले योगी जी प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और केन्द्र में मोदी जी प्रधानमंत्री ? गोरखपुर में भाजपा को हराना अनहोनी थी वहां की जनता ने मुत्तहिद होकर इस अनहोनी को होनी कर दिखाया और यह बताया कि अब कुछ भी नमुमकिन नहीं अगर सब मिल बैठें एक साथ।





