अम्बेडकरनगर देश की सबसे प्रतिष्ठित और कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) अब केवल एक प्रवेश परीक्षा नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का भी प्रतीक बन चुकी है। हर वर्ष लाखों छात्र डॉक्टर बनने का सपना लेकर इस परीक्षा में बैठते हैं। इस प्रतिस्पर्धा के बीच हाल के वर्षों में मुस्लिम समुदाय के अनेक छात्र-छात्राओं ने उल्लेखनीय सफलता हासिल कर यह संदेश दिया है कि शिक्षा ही भविष्य बदलने का सबसे मजबूत माध्यम है।हालांकि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) धर्म के आधार पर सफल अभ्यर्थियों का आधिकारिक डेटा जारी नहीं करती। इसलिए यह कहना कि मुस्लिम छात्रों की सफलता दर में कितनी प्रतिशत वृद्धि हुई है, आधिकारिक रूप से संभव नहीं है। लेकिन हर वर्ष विभिन्न राज्यों से सामने आने वाली सफलताओं से यह स्पष्ट होता है कि समुदाय में मेडिकल शिक्षा के प्रति आकर्षण और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी पहले की तुलना में अधिक गंभीरता से की जा रही है।
इस बदलाव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें मुस्लिम छात्राओं की भागीदारी भी तेजी से बढ़ी है। अनेक छात्राओं ने उत्कृष्ट अंक और उच्च ऑल इंडिया रैंक प्राप्त कर यह साबित किया है कि अवसर मिलने पर वे किसी भी राष्ट्रीय प्रतियोगिता में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकती हैं। परिवारों में शिक्षा को लेकर बदलती सोच, बेटियों की पढ़ाई पर बढ़ता निवेश और सामाजिक जागरूकता इस परिवर्तन की महत्वपूर्ण वजहें हैं।विशेषज्ञ मानते हैं कि पिछले एक दशक में मुस्लिम समाज में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का माहौल पहले से कहीं अधिक मजबूत हुआ है। छोटे शहरों और कस्बों से भी छात्र कोचिंग संस्थानों, ऑनलाइन शिक्षा प्लेटफॉर्म और डिजिटल संसाधनों का उपयोग कर राष्ट्रीय स्तर की तैयारी कर रहे हैं।
इंटरनेट और ऑनलाइन क्लासों ने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच को आसान बनाया है, जिसका सकारात्मक प्रभाव परिणामों में दिखाई दे रहा है।इसके साथ ही कई सामाजिक और शैक्षणिक संस्थाओं ने आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन प्रतिभाशाली छात्रों को छात्रवृत्ति, मार्गदर्शन और नि:शुल्क कोचिंग उपलब्ध कराई है। ऐसे प्रयासों ने अनेक छात्रों को आर्थिक बाधाओं के बावजूद मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी जारी रखने में मदद की है।नीट में सफल होने वाले मुस्लिम छात्रों की कहानियां केवल व्यक्तिगत उपलब्धियां नहीं हैं, बल्कि वे पूरे समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। जब किसी छोटे गांव, कस्बे या साधारण परिवार का छात्र या छात्रा मेडिकल कॉलेज तक पहुंचता है, तो उसके बाद उसी क्षेत्र के सैकड़ों अन्य बच्चों में भी डॉक्टर बनने का सपना जन्म लेता है।
यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि नीट पूरी तरह मेरिट आधारित परीक्षा है। प्रवेश केवल अभ्यर्थी के अंक, रैंक और निर्धारित आरक्षण व्यवस्था के अनुसार होता है। इसलिए किसी भी समुदाय की सफलता का मूल आधार मेहनत, तैयारी और प्रतिस्पर्धा में बेहतर प्रदर्शन ही होता है।आज यह स्पष्ट दिखाई देता है कि मुस्लिम समाज में उच्च शिक्षा, विशेषकर मेडिकल शिक्षा के प्रति जागरूकता पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ी है। यदि गुणवत्तापूर्ण विद्यालयी शिक्षा, आर्थिक सहयोग, करियर मार्गदर्शन और समान अवसर लगातार उपलब्ध होते रहे, तो आने वाले वर्षों में इस समुदाय से और अधिक डॉक्टर, वैज्ञानिक तथा शोधकर्ता देश को मिल सकते हैं।नीट में मुस्लिम छात्रों की बढ़ती मौजूदगी केवल एक समुदाय की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत की शिक्षा व्यवस्था में बढ़ती भागीदारी, अवसरों के विस्तार और प्रतिभा की शक्ति का प्रमाण है। यह संदेश भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि जब शिक्षा प्राथमिकता बनती है, तब सामाजिक और आर्थिक सीमाएं भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती हैं।
एक ओर आस्था, दूसरी ओर शिक्षा: उत्तर प्रदेश का बदलता सामाजिक परिदृश्य
उत्तर प्रदेश का सामाजिक परिदृश्य कई समानांतर धाराओं से गुजर रहा है। एक ओर बड़ी संख्या में अतिपिछड़े समुदायों के लोग कांवड़ यात्रा जैसे धार्मिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर भाग लेते दिखाई देते हैं। दूसरी ओर मुस्लिम समाज के अनेक परिवार अपने बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं, विशेषकर नीट और जेईई जैसी राष्ट्रीय परीक्षाओं की तैयारी के लिए प्रेरित कर रहे हैं।अंबेडकरनगर सहित प्रदेश के कई जिलों में नीट-यूजी में सफल मुस्लिम छात्र-छात्राओं की उपलब्धियां इस बात का संकेत हैं कि शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक उन्नति का माध्यम माना जा रहा है।
सीमित संसाधनों के बावजूद अनेक परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई पर विशेष ध्यान दे रहे हैं और उसका सकारात्मक परिणाम सामने आ रहा है। कांवड़ यात्रा में भाग लेना और शिक्षा प्राप्त करना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सभी समुदायों के लोग धार्मिक आस्था भी रखते हैं और शिक्षा भी प्राप्त करते हैं। इसलिए किसी पूरे वर्ग की प्राथमिकताओं को एक ही पैमाने से नहीं आँका जा सकता।फिर भी यह निर्विवाद है कि जो समाज शिक्षा, कौशल और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में अधिक निवेश करता है, उसके युवाओं के लिए रोजगार और सामाजिक प्रगति के अवसर भी बढ़ते हैं। अंततः किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत उसकी शिक्षित और सक्षम युवा पीढ़ी होती है।
अंबेडकरनगर में भी मुस्लिम छात्रों ने नीट में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर जिले का मान बढ़ाया। उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले अभ्यर्थियों में जलालपुर क्षेत्र के उस्मानपुर निवासी जफर मोहसिन अब्बास सबसे आगे रहे। उन्होंने 720 में से 649 अंक प्राप्त कर ऑल इंडिया रैंक (AIR) 1545 हासिल की, जो जिले की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियों में शामिल है।
दरगाह किछौछा के मोहम्मद सैफ ने 614 अंक प्राप्त कर ऑल इंडिया रैंक 6292 हासिल की। अपनी श्रेणी में उन्हें 2635वीं रैंक मिली। वहीं छज्जापुर की उम्मे ऐमन ने 584 अंक अर्जित कर उल्लेखनीय सफलता दर्ज की।बसखारी की छात्रा जकिया अंजुम ने 618 अंक प्राप्त कर ऑल इंडिया रैंक 5417 हासिल की और जिले की मेधावी छात्राओं में अपनी जगह बनाई।
टांडा के जैनुद्दीनपुर निवासी अबू बकर ने 568 अंक प्राप्त कर मेडिकल प्रवेश परीक्षा में सफलता हासिल की।इसी क्रम में हंसवर के सेमऊर खानपुर निवासी हाफिज अब्दुर रहमान, जलालपुर की तस्बीह जहरा, आलापुर क्षेत्र के नीबा गांव की खान समरीन तथा जहांगीरगंज के ऐनवा निवासी फुरकान ने भी नीट-यूजी में सफलता अर्जित कर अपने परिवार, क्षेत्र और जिले का गौरव बढ़ाया।इन सफलताओं ने यह साबित किया है कि अंबेडकरनगर जैसे जिले के ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों से भी छात्र-छात्राएं राष्ट्रीय स्तर की कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद इन अभ्यर्थियों की मेहनत, अनुशासन और लगन ने यह संदेश दिया है कि मजबूत संकल्प और निरंतर तैयारी के बल पर किसी भी लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।





