चेन्नई में मतदाताओं के बीच डीएमके और एआईडीएमके को लेकर असमंजस है, कई लोग अब तीसरे विकल्प की तलाश में हैं। द्रविड़ मॉडल के कारण राष्ट्रीय दल कमजोर हैं। भ्रष्टाचार और नेतृत्वहीनता जैसे मुद्दों से दोनों प्रमुख दल जूझ रहे हैं।
चेपॉक में व्यवसाय करने वाले युवा दिनेश के. कुमार से जब चुनावी हाल की चर्चा छेड़ी तो एक रट में बोल गए- डीएमके जीत सकती है, हालांकि संभावना एआईडीएमके की भी है, लेकिन मैं चाहता हूं कि विजय की टीवीके जीत जाए। यह उलझन सिर्फ दिनेश की नहीं, बल्कि अधिकतर मतदाताओं की दिखाई पड़ती है।
राज्य की राजनीति में क्रमवार सत्ता प्राप्त करते रहे द्रमुक और अन्नाद्रमुक, दोनों ही ऐसी स्थिति में पहुंच चुके हैं, जिन्हें अब जनता सत्ता का अवसर देगी तो सिर्फ विकल्पहीनता के कारण। दरअसल, द्रविड़ मॉडल ने राष्ट्रीय दलों के लिए फिलहाल तो दरवाजे बंद कर रखे हैं।
क्यों पीछे है कांग्रेस-भाजपा?
वैसे भी कांग्रेस द्रमुक के दबाव में है और भाजपा अन्नाद्रमुक के नेतृत्व में पीछे खड़ी है। यही कारण है कि दोनों राष्ट्रीय दलों से अब तक तमिलनाडु में वह जोर नहीं दिख रहा है जो पश्चिम बंगाल में। 234 विधानसभा सीटों के लिए तमिलनाडु में 23 अप्रैल को मतदान है।
इसके बावजूद राजधानी चेन्नई तक में कोई चुनावी माहौल दिखाई नहीं पड़ता। कौन जीत सकता है या किसे जीतना चाहिए? जैसे सवालों में मतदाताओं में कोई रुचि न होना आश्चर्यचकित करती है। चेन्नई क्षेत्र वैसे तो द्रमुक प्रमुख और वर्तमान मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के प्रभाव वाला क्षेत्र है, लेकिन अब काफी कुछ बदला हुआ नजर आता है।
मतदाता क्यों अनमने से हैं, यह नुगमबकम के रेस्टोरेंट काफी फिल्टर पर खड़े दो दोस्त हरि और विग्नेश काफी हद तक फिल्टर कर देते हैं। विग्नेश द्रमुक पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हैं तो हरि तुरंत ही टोकते हैं, अन्नाद्रमुक की सरकार में भ्रष्टाचार नहीं था क्या?
थोड़ी बहस के बाद दोनों संयुक्त राय देते हैं कि कोई भी आ जाए, कुछ बदलने वाला नहीं है।इसी तरह स्टालिन के निर्वाचन क्षेत्र कोलाथुर की निवेता, युवा मोहम्मद फाजिल, शमीम से लेकर उदयनिधि स्टालिन के निर्वाचन क्षेत्र के सुरेश राजनीति में रुचि से इन्कार कर देते हैं।
सबकी प्रतिक्रिया का निचोड़ लगभग यह था कि राज्य की सत्ता 1969 के बाद से डीएमके के हाथ में रही है या एआईडीएमके के हाथ में। यह किसी तीसरे की मुट्ठी में इसलिए नहीं गई, क्योंकि यहां अन्नादुरई, एमजी रामचंद्रन, एम. करुणानिधि और जयललिता जैसे प्रभावशाली नेता अपने-अपने दलों का नेतृत्व करते रहे।
इन सभी ने द्रविड़ मॉडल को जनता के दिलों में ऐसे उतार दिया कि तीसरी पार्टी के लिए कभी मौका बना ही नहीं। हालांकि अब परिस्थिति बदल चुकी है या कहें कि बदल रही है। डीएमके भ्रष्टाचार और राज्य में बच्चों के साथ अपराध की घटनाओं में वृद्धि जैसे मुद्दों का सामना कर रही है। वहीं, पहले ही दोफाड़ हो चुकी एआईडीएमके के पास कोई प्रभावशाली नेतृत्व नहीं है।
चर्चा में अभिनेता विजय
हां, चर्चा में अभिनेता से नेता बने विजय जरूर हैं। उसका पहला कारण कि तमिलनाडु में सिल्वर स्क्रीन के सितारों को एमजीआर और जयललिता के रूप में चमकते देखा है। इसके अलावा विजय ईसाई मतदाताओं पर प्रभाव डाल सकते हैं।
युवाओं में वह लोकप्रिय भी हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक क्षमताओं को यहां का मतदाता अभी वेट एंड वॉच की स्थिति पर रखे हैं। इतना जरूर है कि विजय मतों में इतनी सेंध लगाने में सफल जरूर हो सकते हैं कि द्रमुक या अन्नाद्रमुक के माथे पर विजय तिलक बहुत कांटे की टक्कर के बाद ही लगेगा।





