इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेटों द्वारा बुजुर्ग माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार की कड़ी निंदा की है। कोर्ट ने कहा कि माता-पिता के साथ क्रूरता संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। कोर्ट ने यह भी कहा कि बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करना बच्चों का नैतिक और वैधानिक दायित्व है। रामदुलार गुप्ता की याचिका पर कोर्ट ने यह आदेश पारित किया।
प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बेटों के बुजुर्ग माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार की कड़ी निंदा की। कहा कि माता-पिता के साथ क्रूरता, उपेक्षा या उनका परित्याग संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानपूर्वक जीवन जीने के उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की खंडपीठ ने कहा कि बच्चों के लिए बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करना पवित्र नैतिक कर्तव्य के साथ वैधानिक दायित्व है। कहा कि जब ‘पुत्रवत’ कर्तव्य समाप्त हो जाता है तो न्यायालयों को कमजोर बुजुर्गों की रक्षा के लिए करुणा के अंतिम गढ़ के रूप में उभरना चाहिए।
रामदुलार गुप्ता की याचिका पर आदेश पारित करते हुए खंडपीठ ने कहा कि शारीरिक शक्ति कम होने के साथ बीमारियां बढ़ती जाती हैं। माता-पिता दान नहीं, बल्कि उन्हीं हाथों से सुरक्षा, सहानुभूति और साथ चाहते हैं, जिन्हें उन्होंने कभी थामा था, जिनका पालन-पोषण किया था। एक 75 वर्षीय पिता ने प्राधिकारियों द्वारा उसकी भूमि अधिग्रहण किए जाने पर मुआवजे के रूप में 21 लाख रुपये से अधिक की राशि जारी करने की मांग की थी, जबकि मुआवजे का आकलन पहले किया जा चुका था।
16 जनवरी, 2025 को भुगतान नोटिस जारी किया गया था, लेकिन याचिकाकर्ता के बेटों द्वारा उठाए गए विवाद के कारण राशि का भुगतान नहीं किया गया। बेटों ने भूमि पर बने भवन में सह-स्वामित्व का दावा किया था। 17 जुलाई, 2025 को न्यायालय ने दर्ज किया कि याचिकाकर्ता के दो बेटों ने अपने पिता को मुआवजे के पूर्ण वितरण का विरोध किया था, क्योंकि उन्होंने तर्क दिया था कि उन्होंने भी भवन निर्माण में योगदान दिया था।
दूसरी ओर याची का कहना था कि पूरा भवन उनके अपने संसाधनों से बनाया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि मुआवजे की घोषणा के बाद बेटों ने उन्हें गंभीर मानसिक और शारीरिक यातना का शिकार बनाया। उन्होंने बेटों के हाथों लगी चोटों को दिखाया।
18 जुलाई को भी याचिकाकर्ता पिता ने न्यायालय के समक्ष उपस्थित होकर दावा किया कि जैसे ही मुआवजे की घोषणा की गई, उसके बाद से ही बच्चों द्वारा उसके साथ आक्रामकता और क्रूरता का व्यवहार किया जाने लगा। कोर्ट के समक्ष बेटों ने अदालत में बिना शर्त माफी मांगी और आश्वासन दिया कि ऐसा व्यवहार दोबारा नहीं होगा। कोर्ट ने कहा कि एक घर जो बुजुर्ग माता-पिता के लिए प्रतिकूल हो गया है, वह अब एक आश्रय नहीं है; यह अन्याय का स्थल है।
“माता-पिता अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष बच्चों के पोषण, शिक्षा और भविष्य के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। बदले में कोई उम्मीद नहीं रखते, लेकिन अपने जीवन के अंतिम क्षणों में क्रूरता, उपेक्षा या परित्याग के रूप में चुकाया जाना नैतिक अपमान और कानूनी अधिकार का उल्लंघन है। -इलाहाबाद हाई कोर्ट