
रजनीश कुमार शुक्ल
विश्व हिंदू परिषद की धर्म संसद में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने सभी साधू-संतों को साधने के लिए अच्छी कोशिश की कुछ संतों को छोड़ सभी उनकी बातों से सहमत हुए और भाजपा को दोबारा सत्ता लाने के लिए प्रतिबद्घता जताई। मोहन भागवत ने मोदी सरकार को एक बार और लाने के लिए छह माह का और समय मांगा। इससे तो यही प्रतीत होता है कि धर्म संसद तो बहाना है भाजपा को पुन: लाना ही संघ का प्रमुख एजेंडा है। संघ प्रमुख मोहन भागवत इसी बहाने सभी संतों का मिजाज भी जान लिया कि साधू संत व अलग-अलग अखाड़ों के प्रमुख किस तरफ रुख करते हैं। वह इन्ही सब बातों को लेते हुए सभी को आमंत्रित किया था और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी मिले थे कि आगे क्या करना है। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने तो वसंत पंचमी से ही अयोध्या कूचकर 12 फरवरी को राम मंदिर के शिलान्यास की घोषणा कर दी। उनके साथ ही अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेन्द्र गिरि ने भी शंकराचार्य के इस आदेश का समर्थन करते हुए चार फरवरी के बाद अयोध्या कूच करने का निर्णय ले लिया।
धर्म संसद के पहले दिन तो सबकुछ ठीक रहा क्योंकि ङ्क्षहन्दुओं के विघटन और धर्मातरण को लेकर प्रस्ताव भी पास किया गया कि हिन्दुओं को जोड़ा जाये क्योंकि उनके बिखरने से ही कट्ïटरवादी ताकतें बढ़ रही हैं। बिछड़े लोगों को घर वापसी की भी सभी ने एक सुर में आवाज लगाई। सबरीमाला का भी मुद्दा उठा और संघ प्रमुख ने उसपर अस्वस्थ भी किया कि वहाँ सब कुछ ठीक है। धर्म संसद में यह भी बताया गया कि केरल सरकार भी अत्याचार और अन्याय कर रही है। यह केवल मलयाली समाज का नहीं पूरे हिन्दू समाज का संकट है। पूरा हिन्दू समाज आंदोलन में सहभागी है। हिन्दू समाज एकसाथ खड़ा हो गया तो उसे तोड़ा नहीं जा सकता।
वहीं राम मंदिर मुद्दे पर धर्म सभा में कोई तारीख तय न होने से नाराज विश्व हिन्दू परिषद के कुछ कार्यकर्ताओं ने विरोध व हंगामा किया। साध्वी प्रियंवदा ने संघ का साथ दिया तो उनके बयान के बाद नारेबाजी ही होने लगी। विरोधियों ने कहा पूरे देश से आये सभी लोग राम मंदिर निर्माण की तारीख चाहते हैं। विरोधियों ने भगवान राम के टाट में होने से पहले भी काफी नाराजगी जताई थी। दिसम्बर में दिल्ली में धर्म संसद हुई थी तब भी राम मंदिर निर्माण की बात की गयी थी लेकिन उसका नतीजा अब तक न निकलने से संघ कार्यकताओं में नाराजगी थी। दिल्ली में संघ के सह- कार्यवाह भैयाजी जोशी ने कहा था ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ की घोषणा की थी और कहा था कि राम मंदिर की घोषणा करने वाले जो लोग आज सत्ता में बैठे हैं। उनको याद दिलाया कि लोकतंत्र में संसद का भी अधिकार है। संसद में कानून लाने की भी बात की थी। लेकिन मोदी ने अपने साक्षात्कार में साफ कर दिया था कि मंदिर निर्माण के लिए कोई अध्यादेश नहीं लायेंगे। यह ममाला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है फैसले के बाद जरूरत पड़ी तो अध्यादेश लाया जा सकता है।
अब लोकसभा चुनाव को देखते हुए वीएचपी प्रमुख मोहन भागवत सभी को एक करने में जुटे हुए हैं वह भी जानते है कि यदि सभी हिन्दू एकजुट नहीं हुए तो मोदी सरकार सत्ता से जा सकती है। क्योंकि यूपी मेें अखिलेश यादव व मायावती का गठबंधन चुनौतीपूर्ण है वहीं कांग्रेज ने जो प्रियंका कार्ड खेला है उससे भी काफी हद तक चुनाव पर असर पड़ेगा। वोट बटने से भाजपा को नुकसान झेलना पड़ सकता है। मोहन भागवत जानते हैं कि भाजपा राम मंदिर की पक्षधर है लेकिन सुप्रीम कोर्ट में केस चलने से उसके फैसले के बाद ही कुछ हो सकता है तभी सभी को अस्वस्थ करने में लगे हैं कि भाजपा ही राम मंदिर का निर्माण करायेगी उसके अलावा कोई भी पार्टी नहीं करा सकती है। भागवत मंदिर निर्माण की दिशा में केंद्र सरकार की अभी तक की कार्रवाई से थोड़ा निराश जरूर दिखे, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि वह हताश नहीं हैं। मंदिर उसी स्थान और पूर्व प्रस्तावित मॉडल के अनुसार ही बनेगा।
उधर दिगम्बर अखाड़ा के महामंडलेश्वर कंप्यूटर बाबा की तरफ से आयोजित ‘संतों के मन की बात’ कार्यक्रम में केंद्र और प्रदेश सरकार के खिलाफ जमकर हमला बोला और 24 दिन का अल्टीमेटम भी दे दिया और अयोध्या कूच करने की चेतावती दे डाली जिससे प्रदेश व केंद्र सरकार की परेशानी बढ़ सकती है। इससे पहले भी कम्प्यूटर बाबा ने मध्य प्रदेश में शिवराज ङ्क्षसह की परेशानी बढ़ाई थी। वहाँ शिवराज ङ्क्षसह पर आरोप लगाया था कि अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए मुझे राज्यमंत्री बनाया था। अब योगी सरकार व मोदी सरकार को परेशानी में डालने के लिए सभी साधुओं को एकजुट कर अयोध्या कूच की तैयारी में हैं। अगर ज्यादातर साधू-संत उनके साथ अयोध्या कूच करते हैं तो संघ प्रमुख के लिए परेशानी बढ़ सकती है जिस प्रकार वह सभी को एकजुट कर मोदी सरकार को पुन: लाने की कवायत कर रहे हैं उसमें बड़ा रोड़ा डाल सकते हैं।
देखा जाये तो कुम्भ में सभी अखाड़ा प्रमुखों और साधू, संतों का मिज़ाज समझने के लिए ही संघ प्रमुख मोहन भागवत ने धर्म संसद का आयोजन किया था। योगी भी उनसे इसी मसले को लेकर मुलाकात की थी। क्योंकि वह मंदिर के पक्षधर हैं लेकिन फैसला न आने और मोदी के कानून न लाने वाले बयान से वह कुछ भी नहीं कर सकते। यूपी की बागडोर होने के कारण उनपर लोकसभा चुनाव का बहुत बड़ा बोझ है। इसलिए वह भी सभी को मनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। अब देखना है कि विरोधी साधूओं को साधने में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और संघ प्रमुख मोहन भागवत कितने सफल होते हैं।
रजनीश कुमार शुक्ल
सह संपादक (अवधनामा ग्रुप )
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