बेटिकट मेजर को पीटने के आरोप बरी हुआ सिपाही : सेना कोर्ट
अनुशासनहीन मेजर सिपाही को अनुशासन के नाम पर दण्डित करने से बाज आएं: विजय कुमार पाण्डेय
सेना कोर्ट लखनऊ के न्यायमूर्ति डी.पी. सिंह ने कोर्ट मार्शल और थल-सेनाध्यक्ष के आदेश को निरस्त करते हुए इलाहाबाद के शंकरगढ़ निवासी ब्रिजेन्द्र कुमार सिंह को दुबारा सेना में लेकर सेना के सभी लाभ दिए जाने का आदेश पारित किया l ए.ऍफ़.टी. बार एसोसियेशन के जनरल सेक्रेटरी विजय कुमार पाण्डेय ने बताया कि प्रकरण यह था कि सिपाही ब्रिजेन्द्र कुमार 26 जनवरी,2008 को हावड़ा-मुम्बई रेल में सेकेण्ड क्लास का रिजर्वेशन टिकट लेकर इटारसी से एस-6 डिब्बे में सवार हुआ उसी डिब्बे में हवलदार ए.के.मिश्रा भी यात्रा कर रहा था, जबलपुर से मेजर ए.पी.गुप्ता जिनके पास रिजर्वेशन का टिकट भी नहीं था लेकिन वे भी रिजर्वेशन कोच एस.6 में सिविल ड्रेस में सवार हुए और सीट नम्बर 31 पर कब्जा जमा लिया जो सिपाही ब्रिजेन्द्र कुमार सिंह के नाम रिजर्व थी थी जब सिपाही ने खाली करने को कहा तो अफसरशाही का रॉब दिखाते हुए हाथापाई करने लगे, शोरगुल सुनकर कर्नल मिश्रा भी आ गए उन्होंने मेजर ए.पी.गुप्ता को अपनी सीट पर बैठा दिया और मानिकपुर उतर गए, मेजर साहब का आरोप था कि जब ट्रेन शंकरगढ़ में रुकी तो मोटरसाईकल से 9-10 लोग स्टील-राड, चैन और डंडा लेकर आए और मेजर की बुरी तरह पिटाई की जिससे उनको काफी चोट आई, सिर से खून निकलने लगा और वे बेहोश हो गए इलाहबाद पहुँचने पर मेजर ने ट्रेन के डिब्बे में चिपके चार्ट से सिपाही का विवरण नोट करके एम्.सी.ओ.आफिस पहुंचकर टू आई.सी. 4 इन्फैंट्री डिवीजन प्रोवोस्ट यूनिट के समक्ष सेना पुलिस की मदद से शिकायत दर्ज कराई जिसके आधार पर कोर्ट आफ इन्क्वायरी, समरी आफ एविडेंस और चार्ज-शीट देकर सिपाही ब्रिजेन्द्र कुमार सिंह का सेना अधिनियम की धारा-40(a) और धारा-34 भारतीय दंड संहिता के तहत कोर्ट मार्शल करके 3 फरवरी 2011 को बर्खास्त कर दिया गया, जिसके विरूद्ध की गई अपील थल-सेनाध्यक्ष ने 28.02.2011 को निरस्त कर दिया जिसे 2011 में सेना कोर्ट में चुनौती दी गईl

विजय पाण्डेय ने बताया कि कोर्ट ने सुनवाई करते हुए कहा कि प्रकरण धारा-34 भारतीय दंड-संहिता की परिधि में नहीं आता जो उच्चतम-न्यायालय के निर्णय सुरेश बनाम यू.पी. सरकार से कवर है और सेना अधिनियम की धारा-40(a) को देखा जाय तो चोट दोनों तरफ आई है और कोई मेडिकल आफिसर भी मेजर की चोट सिद्ध करने के लिए नहीं उपस्थित किया गया जिससे साबित हो सके कि चोट किस तरह की आई है, मौखिक गवाह प्रस्तुत किए गये हैं जो चोट को साबित नहीं करते विजय पाण्डेय ने बताया कि सेना कोर्ट नें अपराध का मूलतत्व ‘इरादा’ का होना नहीं माना दूसरी तरफ मेजर साहब पर भार था कि वे साबित करते कि याची को उनके मेजर होने की विधिवत जानकारी थी जो वे नहीं कर पाए और याची का मामला एन.एन.एम्.वाई.मोमिन बनाम महाराष्ट्र, इथुबा बनाम गुजरात राज्य एवं उ.प्र.बनाम इफ्तिखार खान में उच्चतम-न्यायालय द्वारा अवधारित विधि के समान है कोर्ट ने कहा कि मेजर खुद टिकट न लेकर रेलवे अधिनियम, 1987 की धारा 137 के तहत अपराध कारित किया था और 139 के तहत डिब्बे से बाहर निकालना चाहिए था, धारा 140 यात्रियों से अच्छे व्यवहार करने की अपेक्षा करता है इस प्रकरण में तो टी,टी.ई.आया लेकिन वह भी अपनी ड्यूटी नहीं निभाया उसे मेजर पर कार्यवाही करनी चाहिए थी, आर.पी.ऍफ़.के दो जवान और बी.एस.ऍफ़.के एक कमान्डेंट आये लेकिन कुछ नहीं किया l कोर्ट ने कहा कि अनुशासन-प्रिय भारतीय-सेना के अधिकारी का ऐसा कार्य और व्यवहार समझ के परे है और सरकार पर कड़ी फटकार लगाते हुए कोर्ट ने कहा कि सरकार ने ऐसे अधिकारी के विरुद्ध कठोर कदम क्यों नहीं उठाया गया सबसे पहले तो रेलवे को भारतीय दंड संहिता की धारा-145, 154,155 और 175 के तहत प्रथम सुचना रिपोर्ट दर्ज करनी चाहिए थी लेकिन उसने ऐसा क्यों नहीं किया जबकि रेलवे अधिनियम, 1987 की धारा-180,181 और 182 के तहत उसे शक्तियां प्राप्त है इस आधार पर एक सिपाही के विरुद्ध कदम उठाना कि उसने अपनी सीट के लिए अधिकारी से विवाद क्यों किया जो कि बेटिकट था और गुनाहगार था गलत है l कोर्ट ने सभी लाभ दिए जाने का आदेश पारित किया l
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