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TMC में बगावत की असली वजह कौन? ममता या अभिषेक बनर्जी… तृणमूल में उत्तराधिकार की लड़ाई

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही बगावत अब ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ है। बागी नेता खुद को विधानसभा में वास्तविक विपक्ष बता रहे हैं, जबकि ममता बनर्जी को मार्गदर्शक बनाए रखने की अपील कर रहे हैं।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर चल रही बगावत अब सिर्फ संगठनात्मक विवाद नहीं रह गई है।

पार्टी से निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी और उनके साथ खड़े बागी विधायक जिस तरह लगातार बयान दे रहे हैं, उससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि यह लड़ाई ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं, बल्कि उनके भतीजे और राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ है।

बुधवार को विवाद उस समय और गहरा गया जब ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस ने बागी खेमे के विधायक दल को मान्यता देने के उनके दावे को स्वीकार कर लिया है। बागी नेताओं ने खुद को विधानसभा में “वास्तविक विपक्ष” बताते हुए समानांतर नेतृत्व संरचना का भी एलान कर दिया।

हालांकि, पूरे घटनाक्रम में एक बात बेहद अहम रही कि बागी खेमे ने ममता बनर्जी पर सीधा हमला करने से पूरी तरह परहेज किया। उनके निशाने पर लगातार सिर्फ अभिषेक बनर्जी रहे।

विधानसभा में समानांतर शक्ति प्रदर्शन

ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया कि संसदीय परंपराओं के अनुसार उनकी टोली ही विधानसभा में मुख्य विपक्ष है। वहीं संदीपन साहा ने कहा कि नेता प्रतिपक्ष का कार्यालय भी अब बागी खेमे को आवंटित कर दिया गया है और वहां से कामकाज शुरू हो चुका है।

बागी गुट ने नई विधायी नेतृत्व टीम की भी घोषणा की, जिसमें जावेद खान, संदीपन साहा, सबीना यास्मीन और शिउली साहा को डिप्टी लीडर बनाया गया। लेकिन इस पूरी राजनीतिक लड़ाई के बीच बागियों ने बार-बार ममता बनर्जी को मार्गदर्शक बनाए रखने की अपील की।

ऋतब्रत बनर्जी ने कहा, “हम चाहते हैं कि ममता बनर्जी TMC विधायक दल की मुख्य सलाहकार की भूमिका निभाती रहें।”

संदीपन साहा ने भी कहा, “हमारी इच्छा है कि ममता दीदी हमें मार्गदर्शन देती रहें ताकि हम विधानसभा के भीतर पार्टी को प्रभावी ढंग से चला सकें।”

इन बयानों से साफ है कि बागी खुद को ममता विरोधी नहीं दिखाना चाहते। वे ममता की राजनीतिक विरासत पर दावा करते हुए अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली को चुनौती दे रहे हैं।

विवाद की जड़ में अभिषेक बनर्जी

इस पूरे संकट की शुरुआत नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति को लेकर हुई। आरोप है कि TMC महासचिव अभिषेक बनर्जी ने विधानसभा अध्यक्ष को पार्टी का निर्णय भेजा, लेकिन बागी विधायकों का कहना है कि ऐसा कोई प्रस्ताव विधायक दल की बैठक में पारित ही नहीं हुआ था।

ऋतब्रत और संदीपन साहा ने यहां तक आरोप लगाया कि कुछ विधायकों के हस्ताक्षर फर्जी तरीके से लगाए गए। यहीं से विवाद सीधे अभिषेक बनर्जी की भूमिका पर केंद्रित हो गया। बागियों का कहना है कि समस्या ममता बनर्जी नहीं, बल्कि संगठन पर अभिषेक का बढ़ता नियंत्रण है।

सफलता का श्रेय लेते हैं तो विफलता की जिम्मेदारी भी लें- संदीपन साहा

संदीपन साहा ने खुलकर अभिषेक बनर्जी को पार्टी की मौजूदा स्थिति के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा,”अगर चीजें अच्छी होती हैं तो श्रेय लिया जाता है, इसलिए जब हालात खराब हों तो जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए। पार्टी की मौजूदा स्थिति कहीं न कहीं अभिषेक बनर्जी की विफलता है।”

यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें पहली बार पार्टी की चुनावी और संगठनात्मक समस्याओं को सीधे अभिषेक के नेतृत्व से जोड़ा गया।

उत्तराधिकार की लड़ाई खुलकर सामने?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद दरअसल TMC के भीतर उत्तराधिकार की लड़ाई का संकेत है। पिछले कुछ वर्षों में अभिषेक बनर्जी पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेता बनकर उभरे हैं। वे चुनावी रणनीति, संगठन और प्रचार, तीनों के केंद्र में रहे हैं। ममता बनर्जी के बाद उन्हें पार्टी का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाता रहा है।

लेकिन पार्टी के पुराने नेताओं के एक वर्ग को लगता है कि अभिषेक के बढ़ते प्रभाव के साथ फैसले लेने की प्रक्रिया अत्यधिक केंद्रीकृत हो गई है और जमीनी नेताओं की भूमिका कम हो रही है।

ऋतब्रत बनर्जी ने पहले भी पार्टी में ‘सलाहकारों और रणनीतिकारों’ की बढ़ती भूमिका पर सवाल उठाए थे। उनका इशारा अभिषेक की टीम की ओर माना गया था।

ममता मेरी नेता हैं, अभिषेक कोई नहीं- ऋतब्रत बनर्जी

पार्टी से निष्कासन के बाद ऋतब्रत बनर्जी ने ममता और अभिषेक के बीच साफ राजनीतिक अंतर खींच दिया। उन्होंने कहा कि पार्टी ने मुझे निकाला है, लेकिन मैं अब भी खुद को TMC का हिस्सा मानता हूं। अभिषेक बनर्जी 18वीं विधानसभा में कोई नहीं हैं। लेकिन ममता बनर्जी को लेकर उनका रुख पूरी तरह अलग रहा। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी एक बड़ी नेता हैं। मुझे पार्टी से निकाला गया है, लेकिन उनके प्रति मेरा सम्मान खत्म नहीं हुआ। वह आज भी मेरी नेता हैं।

ऋतब्रत ने अभिषेक पर तंज कसते हुए कहा कि कम से कम लोग मुझे देखकर ‘चोर-चोर’ नहीं कह रहे।

क्यों ‘अछूत’ बनी हुई हैं ममता बनर्जी?

बागी नेता समझते हैं कि ममता बनर्जी अब भी TMC की सबसे बड़ी जननेता हैं। सीधे तौर पर उन्हें चुनौती देना राजनीतिक आत्मघाती कदम हो सकता है। इसीलिए बागी खुद को ममता की असली विरासत का रक्षक बताने की कोशिश कर रहे हैं। उनका तर्क है कि वे पार्टी के मूल चरित्र को बचाना चाहते हैं, जबकि अभिषेक के नेतृत्व में संगठन अत्यधिक केंद्रीकृत हो गया है।

शिवसेना और NCP जैसी स्थिति?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि TMC अब उसी तरह के संक्रमण दौर में पहुंचती दिख रही है जैसा कभी शिवसेना और NCP में देखने को मिला था। शिवसेना में बाल ठाकरे के बाद उत्तराधिकार की लड़ाई ने पार्टी को तोड़ दिया। NCP में शरद पवार और अजित पवार के बीच संघर्ष ने पार्टी को विभाजित कर दिया।

अब TMC के सामने भी सवाल यही है कि क्या अभिषेक बनर्जी वही निर्विवाद स्वीकार्यता हासिल कर पाएंगे जो ममता बनर्जी को दशकों से मिली हुई है?

असली सवाल क्या है?

अब लड़ाई सिर्फ कुछ विधायकों की बगावत तक सीमित नहीं रह गई है। सवाल यह बन चुका है कि क्या TMC में सत्ता का केंद्र धीरे-धीरे ममता से अभिषेक की ओर शिफ्ट हो रहा है? क्या पार्टी का पुराना गुट इस बदलाव को स्वीकार करने को तैयार नहीं? और सबसे अहम—क्या ममता बनर्जी के बाद अभिषेक बनर्जी पूरे संगठन पर वैसी पकड़ बना पाएंगे?

फिलहाल दोनों गुट ममता बनर्जी की विरासत पर दावा कर रहे हैं। लेकिन असली संघर्ष इस बात को लेकर है कि TMC का भविष्य किसके हाथ में होगा।

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