मोहम्मद अली जाफरी द्वारा विकसित ईरान की ‘मोजेक डिफेंस’ रणनीति, अमेरिका और इजरायल के हमलों के बावजूद ईरान को जवाबी कार्रवाई करने में सक्षम बना रही है।
अमेरिका और इजरायल ने जब ईरान पर ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के तहत बड़े हवाई हमले शुरू किए, तो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को उम्मीद थी कि तेहरान में सरकार जल्दी बदल सकती है। लेकिन युद्ध शुरू होने के करीब दो हफ्ते बाद भी ईरान की इस्लामिक सरकार जवाबी हमले कर रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की यह क्षमता उसकी सैन्य रणनीति ‘मोजेक डिफेंस’ की वजह से है, जिसे ईरानी रणनीतिकार मोहम्मद अली जाफरी ने विकसित किया था। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने कहा कि यह रक्षा रणनीति दो दशकों के अध्ययन का परिणाम है, जिसमें अमेरिका की सैन्य हारों से सबक लिया गया है।
ईरान के रक्षा ढांचे की खास रणनीति
अराघची के मुताबिक तेहरान पर बमबारी होने से भी देश की युद्ध क्षमता पर ज्यादा असर नहीं पड़ता। उन्होंने कहा कि ‘मोजेक डिफेंस’ की वजह से युद्ध कब और कैसे खत्म होगा, इसका फैसला ईरान खुद कर सकता है। यह बयान उस समय आया जब अमेरिकी-इजराइली हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत हो गई थी।
मेजर जनरल मोहम्मद अली जाफरी को ईरान की ‘मोजेक डिफेंस’ रणनीति का मुख्य वास्तुकार माना जाता है। वे 2007 से 2019 तक इस्लामी रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर्प्स (IRGC) के प्रमुख रहे। इस संगठन को ईरान की सबसे शक्तिशाली सैन्य ताकतों में गिना जाता है।
बताया जाता है कि इस्लामिक क्रांति के बाद जाफरी ने ईरान के कुर्दिस्तान क्षेत्र में खुफिया इकाई में काम शुरू किया और बाद में देश की सैन्य रणनीति को नया रूप देने में अहम भूमिका निभाई।
ईरान-इराक युद्ध से मिली सीख
जाफरी ने इराक-ईरान युद्ध में भी हिस्सा लिया और धीरे-धीरे आईआरजीसी में ऊंचे पदों तक पहुंचे। 1992 में उन्हें आईआरजीसी की जमीनी सेना का कमांडर बनाया गया और बाद में उन्हें संगठन की एक खास यूनिट ‘सरअल्लाह’ का नेतृत्व भी दिया गया।
2005 में उन्हें आईआरजीसी के रणनीतिक अध्ययन केंद्र का निदेशक बनाया गया, जहां उन्होंने ईरान-इराक युद्ध और 2003 में अमेरिका के नेतृत्व में हुए इराक पर हमले से सबक लेकर ‘मोजेक डिफेंस’ की अवधारणा तैयार की।
क्या है ‘मोजेक डिफेंस’ रणनीति
‘मोजेक डिफेंस’ एक सैन्य रणनीति है, जिसमें पूरे रक्षा ढांचे को कई क्षेत्रीय और अर्ध-स्वतंत्र हिस्सों में बांटा जाता है। इस मॉडल में आईआरजीसी, बसीज बल, नियमित सेना, मिसाइल यूनिट, नौसेना और स्थानीय कमांड मिलकर एक बिखरी हुई लेकिन मजबूत व्यवस्था बनाते हैं।
इसका मतलब है कि अगर किसी एक हिस्से पर हमला होता है या शीर्ष नेतृत्व खत्म हो जाता है, तब भी बाकी सैन्य इकाइयां काम करती रहती हैं। इस रणनीति का पहला लक्ष्य यह है कि ईरान की कमांड व्यवस्था को पूरी तरह नष्ट करना दुश्मन के लिए बेहद मुश्किल हो जाए।
दूसरा लक्ष्य यह है कि युद्ध के मैदान को इतना जटिल बना दिया जाए कि किसी भी ताकतवर देश के लिए युद्ध को जल्दी खत्म करना आसान न हो। इस रणनीति में यह भी माना गया है कि अमेरिका या इजराइल जैसे शक्तिशाली देशों से युद्ध की स्थिति में अगर केंद्रीय नियंत्रण टूट भी जाए, तब भी क्षेत्रीय इकाइयां स्वतंत्र रूप से लड़ाई जारी रख सकें।
इस रणनीति को अपनाने की वजह
यह रणनीति उस समय और मजबूत हुई जब अमेरिका ने 2001 में अफगानिस्तान और 2003 में इराक पर हमला किया। इराक में सद्दाम हुसैन की सरकार का तेजी से गिरना ईरान के लिए बड़ा सबक बना। इसके बाद तेहरान ने अपनी सेना को केंद्रीकृत रखने के बजाय अलग-अलग हिस्सों में मजबूत बनाने की रणनीति अपनाई, जिसे आज ‘मोजेक डिफेंस’ के नाम से जाना जाता है।





