गांधी नगर स्थित अज़ाख़ाना सैयद ज़फ़र (लद्दन सहाब) में आयोजित 1 से 10 सफ़रुल मुज़फ़्फ़र के अशरा-ए-मजलिस की छठी मजलिस रात 9 बजे अज़ाख़ाने में आक़ीदत व एहतेराम के साथ संपन्न हुई। इस मौक़े पर मजलिस को ख़िताब करते हुए मौलाना डॉ. मोहम्मद अस्करी मशहदी ने अहलेबैत की अज़मत और अज़ादारी के सवाब पर विस्तृत रोशनी डाली।
मौलाना अस्करी मशहदी ने अपने ख़िताब में पैग़म्बर-ए-इस्लाम (स.) और अहलेबैत (अ.स.) की तालीमात, करबला के पैग़ाम, इंसानी आक़दार, अख़लाक़ियात और समाज में आपसी भाईचारे व इंसाफ़ की अहमियत पर ज़ोर दिया अज़ादारी के अजर-ओ-सवाब का ज़िक्र करते हुए उन्होंने छठे इमाम, इमाम जाफ़र-ए-सादिक़ अलैहिस्सलाम की एक हदीस का हवाला दिया और कहा:
“मजलिस में रोना तस्बीह-ए-परवरदिगार है, इसमें शरीक होना अल्लाह की इबादत है, और दिल में अहलेबैत की मोहब्बत रखना जिहाद फ़ी सबीलिल्लाह ,(अल्लाह की राह में जिहाद) है। उन्होंने आगे कहा कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का ग़म मनाने के लिए अज़ाख़ाना सजाना, मातम करना और आंसू बहाना अज़ीम सवाब का बाइस (कारण) है। मजलिस के आख़िर में मौलाना ने इमाम हुसैन (अ.स.) की मासूम बेटी जनाब-ए-सकीना (स.अ.) के मसायब (दुख-दर्द) बयान किए, जिसे सुनकर अज़ादारों की आंखें नम हो गईं।
आयोजकों ने जानकारी दी कि इस अशरा-ए-मजलिस का मुख्य उद्देश्य समाज में नैतिक व आध्यात्मिक मूल्यों को मज़बूत करना और इमाम हुसैन (अ.स.) की अज़ीम क़ुर्बानी व उनके पैग़ाम को जन-जन तक पहुँचाना है। प्रबंधकों ने समस्त मोमिनीन व नागरिकों से अपील की है कि वे समय से पहुँचकर मजालिस में शिरकत करें और इस रूहानी व धार्मिक महफ़िल से फ़ैज़याब हों।





