Wednesday, March 4, 2026
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राष्ट्र गौरव “नेताजी सुभाष चन्द्र बोस” के विचार आज भी प्रासंगिक

डा. ए. के. राय

गाजीपुर। भारत माता को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त कराने में देश के जांबाज राष्ट्रभक्तों की कड़ी में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। कटक के बंगाली परिवार तथा उड़ीसा उच्च न्यायालय के प्रख्यात वकील जानकीदास बोस तथा प्रभावती देवी के पुत्र के रुप में 23 जनवरी 1897 को उनके पुत्र के रुप में उत्पन्न नेताजी अपने कृतित्व व व्यक्तित्व से भारत ही नहीं बल्कि विश्व पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ी।अपने देश और लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पित नेताजी ने अपने अदम्य साहस, दृढ़ निश्चय, दूर दृष्टि तथा राजनीतिक व कूटनीतिक चालों से विश्व के अग्रणी नेताओं ने अपना नाम दर्ज कराया। वर्तमान समय में देश में चल रही संक्रमणकालीन परिस्थितियों में नेताजी का व्यक्तित्व आज भी हमारे लिए प्रेरणा स्रोत है और उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं।

ब्रितानी हुकूमत से देश को आजाद कराने हेतु जय हिंद के नारे तथा तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा का उद्घोष कर देशवासियों में राष्ट्रीय जागृति पैदा करने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस से ब्रितानी हुकूमत सदैव भयभीत रही। अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित नेताजी ने अपने नारों की सार्थकता को सिद्ध कर दिखाया। प्रखर प्रतिभा और दृढ़ निश्चय के धनी सुभाष चंद्र बोस ने आई सी एस की परीक्षा 1920 में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण किया। देश को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त कराने हेतु उन्होंने 1921 में आईसीएस से त्यागपत्र देकर इंग्लैंड से वापस स्वदेश लौट आए। स्वतंत्रता आंदोलन को नई धार देने के उद्देश्य से वे कांग्रेस से जूड़े लेकिन महात्मा गांधी की अस्पष्ट राजनीति सुभाष चन्द्र बोस को रास नहीं आयी। हालांकि महात्मा गांधी व नेताजी सुभाष चंद्र बोस दोनों नेताओं का उद्देश्य देश को स्वतंत्र कराना ही था, परंतु रणनीतिक मनभेद के कारण दोनों लोगों के मार्ग अलग हो गये।

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने देश को आजाद कराने हेतु क्रांतिकारी गतिविधियों के संचालन का निश्चय किया। इसी क्रम में कोलकाता में उनकी भेंट चितरंजन दास से हुई और उनसे मार्गदर्शन से नेताजी ने फॉरवर्ड ब्लॉक तथा आजाद हिंद फौज की स्थापना कर स्वतंत्रता के इतिहास में एक अविस्मरणीय अध्याय जोड़ दिया। अंग्रेजी शासकों को नाकों चने चबाने वाले नेताजी को 1940 में सरकार विरोधी गतिविधियों में लिप्तता के कारण कोलकाता के प्रेसिडेंसी जेल में कैद किया गया। वहां से मुक्त होने पर भी उनके घर में ही उन्हें नजरबंद कर दिया गया था। घर में नजरबंदी के दौरान ही वे अपना भेष बदलकर मौलवी के रूप में अपने घर से बाहर निकल गये और सारी सुरक्षा व्यवस्था धरी रह गयी।

घर से निकल कर नेताजी देश बदलते हुए अफगानिस्तान और मास्को होते हुए बर्लिन और फिर वहां से जापान जा पहुंचे। जापान में उन्होंने भारतीय सैनिकों तथा युद्धबंदियों को एकता के सूत्र में पिरोकर तथा राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना से प्रेरित कर 21 अक्टूबर 1943 को आजाद हिंद फौज नामक सशस्त्र सेना का गठन कर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। जात-पात, भेदभाव से रहित उनकी सेना में सभी लोग अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहे। उनकी सेना के तीन प्रमुख अधिकारियों में कैप्टन बीके सहगल हिंदू तो कैप्टन शाहनवाज खान मुस्लिम तथा कैप्टन गुरु बख्श सिंह ढिल्लों सिख रहे। सुभाष चन्द्र बोस के आक्रामक तेवर, युद्ध नीति और सैन्य संचालन से ब्रितानी हुकूमत की नींद उड़ गई।

23 अक्टूबर 1943 को एंग्लो अमेरिकी साम्राज्यशाही के विरुद्ध युद्ध की घोषणा में सुभाष चंद्र बोस के बहादुर सैनिकों ने ब्रिटिश फौजों पर गोलाबारी कर उन्हें अचम्भित कर किया और जापानियों ने स्पष्ट घोषणा कर दी कि आजाद हिन्द फौज (आईएनए) एक स्वतंत्र सेना है।18 नवंबर 1943 को नेताजी टोक्यो से चीन होते हुए 25 नवंबर को सिंगापुर पहुंच गये। आजाद हिंद सरकार को ही भारत की असली सरकार मानकर उसे उस समय 19 देशों ने मान्यता प्रदान की थी। 29 दिसंबर 1943 को जापानियों ने अंडमान निकोबार दीप समूह आजाद हिंद सरकार को सौंप दिया था और नेताजी ने लेफ्टिनेंट लोकनाथन को वहां का गवर्नर नियुक्त किया था। बराबर चल रही लड़ाई में आजाद हिंद फौज ने मणिपुर के इंफाल विष्णुपुर पर कब्जा कर वहां आजाद हिंद सरकार का शेर छाप झंडा फहरा दिया था। इसी बीच रुस ने जापान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

जर्मनी द्वारा रूस पर हमला करने से और रुस द्वारा जर्मनी को हराकर आगे बढ़ने से लड़ाई का रुख बदल गया। 9 अगस्त 1945 से लेकर 16 अगस्त 1945 तक युद्ध की बदली परिस्थितियों पर आपसी विचार विमर्श होता रहा। अन्त में निर्णय के अनुसार नेताजी को कर्नल हबीबुर्रहमान के साथ अन्य सुरक्षित स्थान पर रवाना किया गया। कहा जाता है कि 18 अगस्त 1945 को टोक्यो जाते समय वायुयान में आग लग जाने के कारण नेताजी की मृत्यु हो गई, पर उस मौत की वास्तविकता क्या रही, यह तो आज तक देशवासी नहीं जान सके क्योंकि उस घटना की जांच के लिए गठित आयोगों का कोई सार्थक निर्णय देशवासियों के सम्मुख नहीं आ सका। इतना ही नहीं बल्कि ताइवान में हुई उस वायुयान दुर्घटना को भी तत्कालीक लोगों द्वारा कपोलकल्पित करार दे दिया गया। वास्तविकता चाहे जो हो पर सत्यता यही है कि आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस हमारे मध्य नहीं हैं, परंतु उनके सिद्धांत और विचार आज भी देशवासियों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं, जो भारतीयों के हृदय में देश के प्रति नई चेतना का संचार करते हैं। ऐसे जांबाज, राष्ट्रभक्त, राष्ट्र नायक, महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस को उनकी जयंती पर शत- शत नमन।

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