मुंशीगंज में वीरांगना झलकारी बाई की प्रतिमा पर माल्यार्पण के बाद हुई विचार गोष्ठी
आजादी के आंदोलन में झलकारी बाई के बलिदान और शौर्य गाथाओं पर विस्तार से संवाद हुआ
1857के प्रथम स्वतंत्रता की वीरांगना झलकारी बाई की 195वीं जयंती पर स्थानीय अम्बेडकर मार्केट में वीरांगना झलकारी बाई की प्रतिमा पर माल्यार्पण और विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। विचार गोष्ठी में वीरांगना झलकारी बाई के जीवन दर्शन, शौर्य और बलिदान पर विस्तार से संवाद हुआ।
कार्यक्रम की शुरुआत बौद्ध धम्म की परम्परा के अनुरूप त्रिसरण पंचशील के साथ हुई। बौद्धाचार्य गुरु प्रसाद ने सामूहिक त्रिसरण पंचशील कराया।
कार्यक्रम संयोजक रामशंकर दानी और राजेश कोरी ने लोगों का स्वागत किया। सेवानिवृत्त शिक्षक पलटूराम ने कहा कि वीरांगना झलकारी बाई भारतीय इतिहास की एक कटु सच्चाई है। झांसी के महासंग्राम में वीरांगना झलकारी बाई और उसके पति पूरन कोरी का महान योगदान रहा है।
पति-पत्नी अंग्रेजी सेना से लड़ते हुए रणभूमि में शहीद हुए थे। बामसेफ के जिला संयोजक संजीव भारती ने वीरांगना झलकारी बाई के जीवन दर्शन और शौर्य गाथाओं के बारे जानकारी दी और कहा कि झांसी में महासंग्राम में असली जंग वीरांगना झलकारी बाई ने लडी थी।
उसने वीरता पूर्वक लड़ाई लड़कर अंग्रेजी सेना के छक्के छुड़ा दिए , उसकी वीरता और शौर्य का बखान अंग्रेज सेनापति विलियम ह्यूरोज में अपनी पुस्तक में किया है। वीरांगना झलकारी बाई जयंती समारोह आयोजन समिति के संयोजक कुल रोशन एडवोकेट ने कहा कि वीरांगना झलकारी बाई राष्ट्रीय स्वाभिमान और गौरव की प्रतीक है।समाज की आधी आबादी को इतिहास की जानकारी होनी चाहिए।
ज्योति वर्मा ने कहा कि वीरांगना झलकारी बाई भारतीय नारियों के लिए शक्ति, साहस और ताकत की प्रतीक है।
यहां डा कालिका प्रसाद, सियाराम,जयकरन, दयाराम,राजकरण , राजेश कोरी, अनुभव, शीतला प्रसाद दाढ़ी, सुंदर लाल,शिवदास, कुलदीप ,, फूलचन्द्र बौद्ध, बृजेश कुमार यादव, दयाराम आदि ने वीरांगना झलकारी बाई के चित्र पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए।





