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IIT गुवाहाटी ने किया कमाल, गंदे पानी से जहरीले सीसे को निकालने का खोजा ईको-फ्रेंडली तरीका

आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने उद्योगों के दूषित पानी से जहरीले सीसे को निकालने के लिए एक स्थायी और पर्यावरण-अनुकूल जैविक प्रक्रिया विकसित की है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने उद्योगों से निकलने वाले दूषित पानी से जहरीले सीसे (लेड) को निकालने के लिए स्थायी और पर्यावरण-अनुकूल जैविक प्रक्रिया विकसित की है।

खास बात यह है कि इस प्रक्रिया में कुदरती बैक्टीरिया का इस्तेमाल किया गया है। यह प्रक्रिया परंपरागत रासायनिक विधियों की तुलना में अधिक सुरक्षित और किफायती है।

यह शोध सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर प्रणब कुमार घोष और रिसर्च स्कॉलर श्रीकांत यादव गोला ने किया था। इसके निष्कर्ष जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल केमिकल इंजीनियरिंग में प्रकाशित हुए हैं।

शोध के अनुसार, बैटरी रीसाइक्लिंग के दौरान निकलने वाला पानी सीसी प्रदूषण का एक बड़ा जरिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक, लेड के संपर्क में आने से बच्चों के दिमागी विकास पर बुरा असर पड़ सकता है, नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुंच सकता है और लंबे समय तक रहने वाली स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।

अपशिष्ट पानी से सीसे को निकालने के पारंपरिक रासायनिक तरीके में काफी समय लगता है और बड़ी मात्रा में लेड-युक्त कचरा (स्लज) बनता है, जिसे अलग से निपटाने की आवश्यकता होती है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए आइआइटी गुवाहाटी की टीम ने सल्फेट-घटाने वाले बैक्टीरिया (बिना आक्सीजन के पनपने वाले जीवाणु) का इस्तेमाल किया। नई विधि में लेड-युक्त कचरा तो निकलता है ,लेकिन इसमें लेड की मात्रा काफी कम होती है।

इस तरह काम करती है यह तकनीक

इस तकनीक में बैक्टीरिया पानी में मौजूद सल्फेट को सल्फाइड में बदल देते हैं। इसके बाद यह सल्फाइड पानी में घुले सीसे से प्रतिक्रिया करके ठोस खनिज लेड सल्फाइड बना देता है, जिसे आसानी से छानकर अलग किया जा सकता है। यह प्रक्रिया अपशिष्ट जल की अम्लता को भी कम करती है, जिससे बैक्टीरिया के जीवित रहने के लिए बेहतर परिस्थितियां बनती हैं।

शोधकर्ताओं की सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि अत्यधिक अम्लीय और भारी धातुओं से भरे अपशिष्ट जल में बैक्टीरिया जीवित कैसे रहें। इसके लिए वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया को धीरे-धीरे अधिक अम्लीय और विषैले वातावरण का अभ्यस्त बनाया। इस रणनीति की मदद से बैक्टीरिया लगातार सक्रिय रहे और सीसे को स्थिर ठोस रूप में बदलते रहे।

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