Thursday, March 12, 2026
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नेत्र जांच से रोका जा सकता है ग्लूकोमा से अंधापन, एक्सपर्ट ने बताए बचाव के उपाय

ग्लूकोमा आंखों से जुड़ी एक गंभीर समस्या है, जिसकी समय पर पहचान करना काफी जरूरी है।

नेत्र विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर जांच और नियमित नेत्र परीक्षण से ग्लूकोमा के कारण होने वाली स्थायी दृष्टि हानि को काफी हद तक रोका जा सकता है।

भारत में अनुमानतः 1.2 करोड़ लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं, जबकि करीब 90 प्रतिशत मामलों का समय पर पता नहीं चल पाता । प्रारंभिक चरण में स्पष्ट लक्षण न होने से यह रोग धीरे-धीरे बढ़ता रहता है और देर से उपचार होने पर अंधापन हो सकता है।

विश्व ग्लूकोमा सप्ताह के दौरान बुधवार को आयोजित कार्यक्रम में नेत्र विशेषज्ञों ने रोग के प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। कार्यक्रम का आयोजन बायोफार्मास्यूटिकल कंपनी एबवी इंडिया ने किया। डॉ. सुनीता दुबे, डॉ. हर्ष कुमार, डॉ. रमनजीत सिहोता और डॉ. देवेन तुली सहित विशेषज्ञों ने बताया 40 वर्ष की आयु के बाद नियमित नेत्र जांच बेहद जरूरी है।

आप्टिक तंत्रिका की जांच और इंट्राओक्युलर प्रेशर का मापन ग्लूकोमा की शुरुआती पहचान में मदद करता है। समय पर निदान और उपचार से रोग के बढ़ने की गति को धीमा किया जा सकता है और लोगों की दृष्टि सुरक्षित रखी जा सकती है।

कारण और लक्षण

  • 40 वर्ष से अधिक
  • पारिवारिक इतिहास
  • मधुमेह और हाइपरटेंशन
  • आंखों का बढ़ा हुआ दबाव
  • लंबे समय तक स्टेरायड का उपयोग

क्या हैं बचाव के उपाय

40 वर्ष से अधिक आयु के सभी लोगों को हर वर्ष में नेत्र जांच करानी चाहिए, जिनके परिवार में ग्लूकोमा का इतिहास हो उन्हें 35 वर्ष की आयु से ही नियमित नेत्र जांच शुरू कर देनी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लूकोमा से होने वाली दृष्टि हानि स्थायी होती है, लेकिन नियमित जांच के माध्यम से इसे रोका या नियंत्रित किया जा सकता है।

‘साइलेंट थीफ आफ साइट’ बना काला मोतिया

ग्लूकोमा, जिसे आम भाषा में ‘काला मोतिया’ भी कहते हैं, धीरे-धीरे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनती जा रहा है। यह बीमारी आंख की आप्टिक नर्व को खामोशी से नुकसान पहुंचाती है। अधिकांश मामलों शुरुआत में स्पष्ट लक्षण नहीं दिखता। बाद में जब तक इसका पता चलता है, यह गंभीर हो चुकी होती है।

यहां तक कि उपचार न मिलने पर स्थायी अंधापन का कारण बन जाती है । इसे ‘साइलेंट थीफ आफ साइट’ भी कहते हैं । कई अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल में प्रकाशित अध्ययनों के अनुसार भारत 40 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में ग्लूकोमा की प्रसार दर 2.7 से 4.3 प्रतिशत तक है। एम्स के डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेत्र विज्ञान केंद्र के प्रो. राजपाल के अनुसार दिल्ली में करीब दो लाख लोग ग्लूकोमा से पीड़ित हैं, जबकि हर वर्ष करीब 10 हजार नए मामले सामने आते हैं।

विशेषज्ञों की सलाह

स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं, नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और धूम्रपान से परहेज करें। आंख की नियमित जांच आवश्यक है, क्योंकि जितनी जल्दी बीमारी का पता चलता है, उतनी ही आसानी से दवाओं, लेजर या सर्जरी से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। देरी से बचें, क्योंकि खोई हुई कभी दृष्टि वापस नहीं आती।

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