Monday, February 23, 2026
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विदा होती बेटियाँ” : जहाँ कविता करुणा बनकर समाज से संवाद करती है

(डॉ. ओम प्रकाश के काव्य-संग्रह “विदा होती बेटियाँ” पर एक भावपूर्ण समीक्षा)

आज का समय सुविधाओं, तकनीक और गति का समय है। सूचनाएँ बढ़ी हैं, साधन बढ़े हैं, पर इन्हीं के बीच कहीं न कहीं मनुष्य के भीतर की संवेदना कम होती जा रही है। रिश्ते हैं, पर ‘समय’ नहीं; संवाद है, पर ‘आत्मीयता’ नहीं; भीड़ है, पर ‘साथ’ नहीं। ऐसे दौर में जब समाज का बड़ा हिस्सा भावनात्मक रूप से सूखता जा रहा हो, तब कविता केवल कला नहीं रह जाती—वह मानवीय पुनर्जीवन का माध्यम बन जाती है। डॉ. ओम प्रकाश का नवीन काव्य-संग्रह “विदा होती बेटियाँ” इसी अर्थ में एक उल्लेखनीय साहित्यिक दस्तावेज़ है। यह संग्रह शब्दों का खेल नहीं, बल्कि समय की स्मृति, समाज की पीड़ा और करुणा की पुनर्प्रतिष्ठा है।

यह काव्य-संग्रह हमें आरंभ से ही यह सोचने पर विवश करता है कि मनुष्य होने का अर्थ क्या है, और क्या आज भी हमारे भीतर उतनी संवेदना बची है कि हम किसी दूसरे के दर्द को अपना समझ सकें? संग्रह की कविताएँ उन तमाम रिश्तों, संघर्षों और भावनाओं की परतें खोलती हैं जिन्हें आधुनिक जीवन की दौड़ ने लगभग विस्मृत कर दिया है। डॉ. ओम प्रकाश का काव्य-संसार घर-आँगन से निकलकर समाज की गलियों तक जाता है—और वहीं से लौटकर पाठक के भीतर मनुष्यता की लौ प्रज्वलित करता है।

कविता में जीवित करुणा का स्वर

“विदा होती बेटियाँ” की सबसे बड़ी उपलब्धि है—इसमें उपस्थित सक्रिय करुणा। यह करुणा निष्क्रिय, रोती-बिलखती या केवल भावुकतापूर्ण नहीं है, बल्कि भीतर से उठती हुई ऐसी संवेदना है जो मनुष्य को टूटने से बचाती है और समय की कठोरता के विरुद्ध एक आत्मबल रचती है। कवि की पंक्तियाँ—

“हे प्रभु / आँखों में सपने देना / तो उन्हें पूर्ण करने का साहस भी देना / ताकि बोझिल पंख लिए / विदा होने से बचा सकूँ ख़ुद को।”

केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा का संघर्ष हैं। इन पंक्तियों में एक ऐसा सच है जो आज के दबाव, अकेलेपन और मानसिक थकान से गुजरते हर व्यक्ति के भीतर प्रतिध्वनित हो सकता है।

कवि के यहाँ ‘विदाई’ मात्र एक घटना नहीं, बल्कि एक प्रतीक है। यह विदाई बेटियों की है, रिश्तों की है, समय की है, और उन मूल्यों की भी है जिनके बिना समाज केवल भीड़ बनकर रह जाता है। यह कविता सिखाती है कि संवेदना कमजोर नहीं होती—वह मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है।

बेटियों की विदाई और समाज का मौन प्रश्न

शीर्षक कविता “विदा होती बेटियाँ” आधुनिक भारतीय समाज की जड़ों तक उतरती है। यह कविता सिर्फ एक बेटी की भावनात्मक विदाई नहीं, बल्कि व्यवस्था की आत्मालोचना है। कवि कहते हैं—

“विदा होती बेटियाँ / कभी-कभी / हमेशा के लिए भी / विदा हो जाती हैं।”

यहाँ कविता पाठक के भीतर एक चुभता हुआ प्रश्न छोड़ जाती है—क्या बेटी का लौटना आज भी उतना सहज और स्वाभाविक है जितना बेटों के लिए? क्या स्त्री का होना अब भी एक स्थायी संघर्ष है? डॉ. ओम प्रकाश ने स्त्री को नारे या प्रचार के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के समग्र अनुभव के रूप में देखा है। इसीलिए उनकी बेटियाँ केवल घर की बेटियाँ नहीं, बल्कि समय की प्रतिनिधि हैं—जो जाती तो हैं, पर अपने पीछे समाज का चेहरा छोड़ जाती हैं।

माँ और पिता : रिश्तों की जड़ में उतरती कविताएँ

संग्रह का एक अत्यंत भावुक और मजबूत पक्ष है—माता-पिता पर लिखी कविताएँ। यहाँ ‘पिता’ किसी महिमामंडित प्रतीक के रूप में नहीं आते, बल्कि जीवन की धूप में तपते उस व्यक्ति के रूप में आते हैं जिसकी छाँव में हम निश्चिंत रहे और जिसका संघर्ष हमने अक्सर देर से समझा। कवि लिखते हैं—

“पिता की छाँव में, बेफ़िक्र ज़िंदगी बिताते हुए सोचा कहाँ था कि सिर पर साया न हो तो असमय पतझड़ में झुलस जाते हैं ख़्वाब।”

यह कविता केवल स्मरण नहीं, बल्कि रिश्तों के भीतर छिपे सत्य का उद्घाटन है। इसी तरह ‘माँ का अकेलापन’ कविता आधुनिक समाज का तीखा यथार्थ प्रस्तुत करती है, जहाँ माँ शहर की भीड़ में भी अकेली रह जाती है—

“भीड़ भरे शहर में, अकेली हूँ मैं चीखती हूँ भयावह सन्नाटे में और लौट आती है मेरी आवाज़ — तुम तक नहीं पहुँचती।”

यह कविता हमें कटघरे में खड़ा करती है और पूछती है—क्या विकास की दौड़ में हमने अपने ही रिश्तों को खो दिया है? यहाँ माँ सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उस पूरी पीढ़ी की प्रतीक बन जाती है जो अपनों के व्यस्त जीवन में धीरे-धीरे अकेली पड़ती जा रही है।

मजदूर और समाज : कविता का विस्तार

डॉ. ओम प्रकाश की कविताएँ घर और भावना से आगे निकलकर समाज की कठोर वास्तविकताओं तक जाती हैं। ‘मजदूर’ और व्यवस्था-चेतना वाली कविताएँ साबित करती हैं कि कवि केवल निजी नहीं, सार्वजनिक दर्द को भी उतनी ही गंभीरता से देखता है। कवि की पंक्तियाँ—

“लालकिले की प्राचीर से मैं ही गूँजता हूँ मैं ही अनसुना रह जाता हूँ संसद में।”

यहाँ मजदूर की पीड़ा, लोकतंत्र की विडंबना और सत्ता की दूरी—सब एक साथ झलकते हैं। यह कविता श्रम की आवाज़ है, जो बड़े मंचों पर गूंजती तो है, पर सुनी नहीं जाती।

प्रेम : उजाला रचने वाली शक्ति

इस संग्रह में प्रेम भी है, मगर यह प्रेम सिर्फ निजी भावुकता नहीं। यह प्रेम जीवन के अंधेरों में उजाला बनाने की क्षमता है—

“मैं छुपाता हूँ अपने भीतर प्यार ताकि घनघोर अँधेरे को तुम्हारी चौखट का सूरज बना सकूँ।”

यह प्रेम व्यक्ति को भीतर से मजबूत करता है और जीवन को फिर से अर्थ देता है। कवि के यहाँ प्रेम स्मृति, संघर्ष और उम्मीद से जुड़ा हुआ है—इसलिए वह पाठक के भीतर देर तक बना रहता है।

भाषा की सादगी, अर्थ की गहराई

डॉ. ओम प्रकाश की भाषा सजावट नहीं चाहती। यह सरलता ही इस संग्रह की शक्ति है। कविता पाठक को झकझोरती नहीं, बल्कि धीरे-धीरे भीतर उतरती है—जैसे किसी घाव पर मरहम रख दिया गया हो। कवि का यह कथन पूरे संग्रह का सार बन जाता है—

“सबसे कठिन है / कठोर वक़्त में / ख़ुद को सरल बनाए रखना।”

यही कविता की सबसे बड़ी विजय है—कि वह कठोर समय में भी मनुष्य को सरल, करुण और संवेदनशील बनाए रखने का संकल्प जगाती है।

कविता जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है

“विदा होती बेटियाँ” एक ऐसा काव्य-संग्रह है जो आज के संवेदनहीन होते वातावरण में मनुष्यता का पुनःस्थापन करता है। इसमें पिता का पसीना है, माँ की आँखों की नमी है, बेटियों की विदाई है, मजदूर की भूख है और प्रेम का उजाला है। कवि की पंक्तियाँ—

“कभी सोचा कहाँ था / एक दिन ऐसा होगा जब सब कुछ होगा मेरे पास / और तुम नहीं होगी माँ।”

पाठक को भीतर तक द्रवित कर देती हैं। यह संग्रह हमें हमारे मूल की ओर लौटने को प्रेरित करता है—जहाँ प्रेम, विश्वास और करुणा ही सभ्यता का सार हैं। आज जब समाज संवेदनहीनता की ओर बढ़ता दिख रहा हो, तब “विदा होती बेटियाँ” जैसी कविताएँ याद दिलाती हैं कि मनुष्य को बचाने के लिए कविता अब भी जरूरी है।

कवि-परिचय

डॉ. ओम प्रकाश समकालीन हिंदी कविता के संवेदनशील रचनाकार हैं। उनकी कविताओं में स्त्री-जीवन, पारिवारिक रिश्तों, श्रम-संघर्ष, सामाजिक यथार्थ और प्रेम की मानवीय ऊष्मा प्रमुखता से दिखाई देती है। सरल, सहज और प्रभावकारी भाषा उनकी रचनाओं की विशेषता है। वर्तमान में वे एनटीपीसी सिंगरौली (शक्तिनगर, सोनभद्र) में उप महाप्रबंधक (मानव संसाधन–राजभाषा) के पद पर कार्यरत हैं। उनका चर्चित काव्य-संग्रह “विदा होती बेटियाँ” संवेदना की पुनर्प्रतिष्ठा करने वाली महत्वपूर्ण कृति है।

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