संभल। उरुज संभली/नवासा ए रसूल हज़रत इमाम हुसैन और उनके साथियों का चेहल्लुम मंगलवार चार अगस्त बीस सफ़र को मनाया जायेगा। मोहर्रम की दस तारीख को कर्बला के मैदान में हज़रत इमाम हुसैन समेत बहत्तर लोगों को तीन दिनो का भुखा प्यासा शहीद कर दिया गया था शहादत के बाद आने वाले चालीसवें दिन चेहल्लुम मनाया जाता है चेहल्लुम को अरबी भाषा में अरबईन भी कहते हैं। सन 62 हिजरी में कर्बला के मैदान में स्थित इमाम हुसैन के रोज़े चेहल्लुम का सबसे पहला आयोजन किया गया था। पैगम्बर ए इस्लाम हज़रत मोहम्मद साहब के साथी जाबिर इब्ने अब्दुल्ला सबसे पहले इमाम हुसैन के रोज़े की जियारत करने वाले जायर थे और इन्होंने शोक की शुरुआत की थी। बताया जाता है कि यजीद ने इमाम हुसैन के परिवारजनों को जब कैद से रिहा किया और शहीदों के सरो औरतों से छिनी गयी चादरों व अन्य सामान लौटा दिया था तब इमाम हुसैन के बेटे इमाम जैनुल आबेदीन जो कर्बला की दर्दनाक घटना के समय बीमारी के कारण युद्ध में शामिल नहीं हुए थे के साथ औरतों और बच्चों को दसवें मोहर्रम को कैद कर लिया गया था क़ैद से रिहा हो कर इनका काफिला पहले कर्बला पहुंचा था जहां इमाम हुसैन की बहन हज़रत जैंनब और बाकी शहीदों की बेवाओ बच्चों ने शहीदों के मजारो पर मातम किया क्योंकि कैद के दौरान यजीद की जालिम साथियों ने इनको अपने वारिसों का मातम करने नहीं दिया था। कुछ दिन कर्बला में कायम करने के बाद काफिला कर्बला से मदीना के लिए रवाना हो गया था। चेहल्लुम के दिन भी दस मोहर्रम की तरह ताजियों को सुर्पुद खाक किया जाता है लोग अपने अपने क्षेत्रों में बनी कर्बलाओ में देर शाम को ताजियों को लेजा कर सुर्पुद खाक करते हैं। मातम जुलूस में मर्सिया ख्वानी नोहा ख्वानी करके मातम किया जाता है मजलिसो का आयोजन होता है चेहल्लुम के दिन अजांदारो द्वारा जंजीरों में लगी छुरियों से मातम किया जाता है तो कुछ अजादारो द्वारा दहकते अंगारों पर चल कर मातम किया जाता है। चेहल्लुम के दिन अजांदारो द्वारा अपने घरों में इमाम हुसैन और उनके साथियों की नजरों नियाज की जाती है।





