हेल्थ डेस्क। लगातार खांसी, सांस लेने में परेशानी, सीने में जकड़न और घरघराहट जैसी समस्याएं कई बार लोगों को असमंजस में डाल देती हैं। अक्सर इन लक्षणों को देखकर अस्थमा और ब्रोंकाइटिस को एक ही बीमारी समझ लिया जाता है, जबकि दोनों के कारण, बीमारी की प्रकृति और इलाज में अंतर हो सकता है। फेफड़ों की सेहत को बेहतर बनाए रखने के लिए इन दोनों स्थितियों के बीच अंतर समझना जरूरी है।
क्या है अस्थमा, क्यों होती है सांस लेने में परेशानी
अस्थमा यानी दमा फेफड़ों की वायु नलिकाओं से जुड़ी एक दीर्घकालिक बीमारी है। इसमें सांस की नलिकाओं में सूजन और संवेदनशीलता बढ़ जाती है। कुछ परिस्थितियों में ये नलिकाएं सिकुड़ जाती हैं, जिससे सांस लेने में परेशानी होने लगती है।
अस्थमा के प्रमुख लक्षण:
- सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज आना।
- रात या सुबह के समय खांसी बढ़ना।
- सांस फूलना और सीने में जकड़न महसूस होना।
- धूल, धुएं, परागकण, ठंडी हवा या व्यायाम से लक्षण बढ़ना।
- लक्षणों का बार-बार उभरना और फिर कुछ समय के लिए कम हो जाना।
अस्थमा के लक्षण हर व्यक्ति में एक जैसे नहीं होते। सही पहचान के लिए डॉक्टर लक्षणों के साथ फेफड़ों की कार्यक्षमता की जांच भी करा सकते हैं।
ब्रोंकाइटिस क्या है और कैसे करता है प्रभावित?
ब्रोंकाइटिस में फेफड़ों तक हवा पहुंचाने वाली मुख्य नलियों, जिन्हें ब्रॉन्काई कहा जाता है, में सूजन आ जाती है। इसके कारण खांसी और बलगम की समस्या हो सकती है।
ब्रोंकाइटिस मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है।
1. एक्यूट ब्रोंकाइटिस: यह अक्सर वायरल संक्रमण के बाद होता है। इसमें खांसी, बलगम, गले में खराश और कभी-कभी हल्का बुखार हो सकता है। खांसी कुछ सप्ताह तक बनी रह सकती है।
2. क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस: इसमें लंबे समय तक बलगम वाली खांसी बनी रहती है। चिकित्सकीय रूप से इसकी पारंपरिक परिभाषा में लगातार दो वर्षों तक, हर वर्ष कम से कम तीन महीने बलगम वाली खांसी होना शामिल है, बशर्ते अन्य कारणों को बाहर किया गया हो। यह अक्सर धूम्रपान या लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क से जुड़ा होता है और सीओपीडी का हिस्सा हो सकता है।
डॉक्टर किन जांचों से करते हैं बीमारी की पहचान?
डॉक्टर मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, लक्षणों की अवधि, धूम्रपान या एलर्जी के इतिहास और शारीरिक जांच के आधार पर आगे की जांच तय करते हैं। अस्थमा की पुष्टि के लिए स्पाइरोमेट्री और ब्रोंकोडाइलेटर के बाद फेफड़ों की कार्यक्षमता में बदलाव की जांच उपयोगी हो सकती है। जरूरत पड़ने पर अन्य जांचों से संक्रमण या फेफड़ों की दूसरी बीमारियों का पता लगाया जाता है।
फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए क्या करें?
- धूम्रपान और दूसरे के धुएं से बचें।
- धूल, प्रदूषण और अन्य ज्ञात ट्रिगर से संपर्क कम करें।
- डॉक्टर की सलाह के अनुसार निर्धारित दवाओं और इनहेलर का इस्तेमाल करें।
- बिना चिकित्सकीय सलाह के एंटीबायोटिक या स्टेरॉयड शुरू न करें।
- लगातार खांसी, बार-बार घरघराहट या सांस फूलने पर डॉक्टर से परामर्श लें।
कब तुरंत चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है?
यदि सांस लेने में बहुत अधिक परेशानी हो, व्यक्ति पूरे वाक्य न बोल पा रहा हो, होंठ नीले पड़ने लगें, भ्रम हो या निर्धारित रिलीवर इनहेलर से राहत न मिले, तो तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें।





