अमेरिका। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई वैक्सीन नीति को लेकर स्वास्थ्य क्षेत्र में बहस तेज हो गई है। योजना के तहत बच्चों के लिए कुछ संयुक्त टीकों, खासकर MMR यानी खसरा, गलसुआ और रूबेला के टीके को अलग-अलग खुराक में देने की दिशा में बदलाव का प्रस्ताव है।
डॉक्टरों पर बढ़ सकता है आर्थिक और लॉजिस्टिक बोझ
अगर संयुक्त वैक्सीन की जगह अलग-अलग टीके दिए जाते हैं, तो बच्चों को डॉक्टर के पास ज्यादा बार ले जाना पड़ सकता है। इससे अपॉइंटमेंट, स्टाफ और वैक्सीनेशन से जुड़ी प्रशासनिक लागत बढ़ने की आशंका है। विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादा विजिट का सीधा असर परिवारों और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं दोनों पर पड़ सकता है।
दवा कंपनियों के सामने सबसे बड़ी अड़चन क्या?
अमेरिका में खसरा, गलसुआ और रूबेला के अलग-अलग टीके फिलहाल नियमित रूप से उपलब्ध नहीं हैं। रिपोर्टों के अनुसार, व्यक्तिगत वैक्सीन के दोबारा विकास, क्लिनिकल परीक्षण, FDA की मंजूरी और नई उत्पादन व्यवस्था में कई साल लग सकते हैं—कुछ विशेषज्ञों ने संभावित अवधि करीब एक दशक तक बताई है।
दवा कंपनियों के लिए एक और चुनौती निवेश से जुड़ी है। अगर अलग-अलग टीकों की मांग सीमित रही, तो कंपनियों के लिए नई उत्पादन क्षमता विकसित करने का आर्थिक जोखिम बढ़ सकता है। Merck और GSK ने संयुक्त MMR वैक्सीन के समर्थन में दशकों के सुरक्षा और प्रभावशीलता संबंधी आंकड़ों का हवाला दिया है।
अभी क्या स्थिति है?
ट्रंप का कार्यकारी आदेश तुरंत अमेरिकी वैक्सीन व्यवस्था को पूरी तरह बदल नहीं देता। विशेषज्ञों के मुताबिक इसे लागू करने में कानूनी, नियामकीय और व्यावहारिक अड़चनें हैं। मौजूदा संयुक्त MMR वैक्सीन की सुरक्षा और प्रभावशीलता के समर्थन में दशकों के वैज्ञानिक आंकड़े मौजूद हैं।
कुल मिलाकर, योजना का उद्देश्य वैक्सीनेशन व्यवस्था में बदलाव करना है, लेकिन इसके अमल में डॉक्टरों पर अतिरिक्त काम, परिवारों के लिए ज्यादा विजिट और दवा कंपनियों के लिए भारी विकास व उत्पादन लागत जैसी चुनौतियां सामने आ सकती हैं।





