5अप्रैल को वीरांगना झलकारी बाई के बलिदान दिवस की तैयारी -मयास में हुई बैठक
1857के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजी सेना से लड़ते-लड़ते रणभूमि में शहीद हुई झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की स्त्री सेना की सेनापति वीरांगना झलकारी बाई के बलिदान दिवस मनाने की तैयारी को लेकर मयास में बैठक हुई। वरिष्ठ बौद्धाचार्य हौसिला प्रसाद ने कहा कि भारत का बहुजन समाज लम्बे समय तक इतिहासकारों की भेदभावपूर्ण लेखनी का शिकार रहा। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम-का इतिहास वैसा नहीं है जैसा मनुवादी इतिहासकारों ने लिखा है।
झांसी के महासंग्राम में सबसे बड़ा योगदान गोलंदाज पूरन कोरी और वीरांगना झलकारी बाई का रहा है। वीरांगना झलकारी बाई रानी लक्ष्मीबाई की हमशक्ल रही और उसने झांसी की रानी को सुरक्षित रूप से किले से बाहर निकाल कर स्वयं अंग्रेजी सेना से लड़ाई लडी। रणभूमि में अपने पति पूरन कोरी के मारे जाने की सूचना के बाद भी पीछे नहीं हटी और अंग्रेजी सेना से अंत तक लगती रही, परंतु इतिहासकारों ने कलम चलाते समय उसका जिक्र तक नहीं किया।
वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता उदयराज ने कहा कि बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने कहा था, इतिहास बनाने के लिए इतिहास जानना आवश्यक है। बहुजन समाज के लेखकों की जागरूकता से वीरांगना झलकारी बाई का इतिहास आजादी के लगभग चालीस साल बाद देश की जनता के सामने आया है। उपन्यासकार वृंदावन लाल वर्मा की पुस्तक झांसी की रानी में सबसे पहले वीरांगना झलकारी बाई का नाम और उसकी वीरता सामने आई है।अब तो बहुजन समाज के दर्जनों लेखकों की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
तैयारी बैठक में सेवानिवृत्त शिक्षक रामहर्ष ने सर्वसमाज के लोगों से 5 अप्रैल को गौरीगंज में आयोजित बलिदान दिवस के कार्यक्रम में शामिल होने की अपील की। संतोष कुमार ने कहा कि आजादी के महासंग्राम में कोरी, पासी एवं अन्य दलित जातियों के शूरवीरों और वीरांगनाओं का महान योगदान रहा है। बैठक का संचालन आयोजन समिति के संयोजक राम सजीवन कोरी मंझवारा ने किया। मास्टर बाबूलाल,वीर चंद्र, रामकुमार, प्रदीप कुमार,मुरारी प्रसाद, राम प्रसाद,समर बहादुर, शंकर लाल, चैतराम, सुरेश कुमार, हरिकेश, राम भूल, वीरेंद्र आदि मौजूद रहे।





