दक्षिण एशियाई यूनिवर्सिटी (SAU) के प्रेसिडेंट प्रो. के.के. अग्रवाल ने शिक्षा के वैश्विक बदलावों के अनुकूल होने पर जोर दिया। उन्होंने छात्रों में जिज्ञासा जगाने, अंतर-सांस्कृतिक समझ विकसित करने और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने की बात की।
एसएयू यानी दक्षिण एशियाई यूनिवर्सिटी में सार्क से जुड़े आठ देशों के छात्र पढ़ने की व्यवस्था है। इसके साथ यहां छात्रों के हित को देखते हुए बेहतर सुविधाएं व परिवेश की बात की जाती है। आज वैश्विक बदलावों को देखते हुए कैसा होना चाहिए शिक्षा का स्वरूप, किन बातों को देना चाहिए महत्व, ऐसे कुछ आवश्यक बिंदूओं पर एसएयू के प्रेसिडेंट प्रोफेसर के के अग्रवाल से बातचीत के प्रमुख अंश यहां साझा किये जा रहे हैं…सीमा झा
छात्रों के मन में जिज्ञासा पैदा करना शिक्षक का काम
क्या छतरी और टाइ का आपस में मेल हो सकता है? मस्तिष्क पर जोर डालें तो भी आप संभवतया इसका तार्किक जवाब न दे सकें। यहीं एक शिक्षक का काम शुरू होता है। कक्षा में उन्हें ऐसे ही कुछ अनजान विषयों की चर्चा करनी चाहिए ताकि छात्रों में जिज्ञासा उत्पन्न हो। दरअसल, ऐसी जिज्ञासा व उत्सुकता ही शिक्षा का मूल आधार है। इससे ही नवाचार व शोध का परिवेश तैयार हो सकता है। अब समय आ गया है कि भारी बस्ते, सीजीपीए या कैंपस प्लेसमेंट व सैलरी पैकेज तक शिक्षा व्यवस्था को सीमित न किया जाए। एसएयू में हम इसी तरह का प्रयास करते हैं। यहां शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता न हो इसका विशेष ध्यान रहता है। यदि गुणवत्ता नहीं होगी तो दूसरे देशों के बच्चे यहां पढ़ने क्यों आएंगे। जब उन्हें अपने देश में अच्छी शिक्षा मिल जाएगी तो भारत तभी आएंगे जब वे यहां अधिक बेहतर शिक्षा प्राप्त कर सकें।
एएसयू में प्रवेश क्यों लेना चाहिए?
यहां विविध संस्कृतियों के बीच रहकर अंतर-सांस्कृतिक समझ बनती है। यह वैश्विक नागरिक बनने के लिए जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर की फैकल्टी और बेहतरीन बुनियादी सुविधाओं के लिए भी एसएयू छात्रों में लोकप्रिय हो रहा है। एक्सटर्नल अफेयर्स के अंतर्गत यह यूनिवर्सिटी है इस कारण हमेशा यहां पुलिस मौजूद रहती है। यानी सुरक्षा व्यवस्था भी अच्छी है। उच्च स्तरीय शोध, अकादमिक उत्कृष्टता, स्नातकोत्तर, व पीएचडी स्तर के लिए छात्रों की संख्या में निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही है। दूसरी बात, यहां निजी संस्थानों के मुकाबले फीस भी रिजनेबल है। उनसे न बहुत अधिक न ही सेंट्रल यूनिवर्सिटी की तरह बहुत कम है।
कौन से प्रमुख कोर्स हैं, जिनकी मांग अधिक रहती है?
अंतराष्ट्रीय संबंध, अर्थशास्त्र, कानून व जैव प्रौद्योगिकी आदि विषयों में उच्च स्तरीय कोर्स व शोध के लिए लोकप्रिय है। अंतराष्ट्रीय संबंध के लिए अभी जो सर्विस दे रहे हैं वे अफसर भी यहां आते हैं। बीते वर्ष इसकी बढ़ती मांग को देखते हुए इसकी सीट दुगुनी की गयी है। हमारे यहां लीगल स्टडीज में भी छात्रों की अच्छी संख्या है। एलएलएम इंटरनेशनल की भी खूब मांग है। यह एक यूनीक प्रोग्राम है जिसमें वे सभी आठ देश के कानूनी तथ्यों को कोर्स में जगह दी गयी है। इसका अर्थ है कि एक कामन सिलेबस तैयार किए हैं जिससे कि वह सभी के लिए सुविधाजनक हो। इसी तरह, दक्षिण एशियाई देशों के पर्यावरणीय समस्याओं से जुड़े कोर्स भी हैं। इन समस्याओं में तटीय क्षेत्रों की समस्याएं, लैंडस्लाइड आदि प्रमुख हैं।
प्लेसमेंट सेल की क्या स्थिति है?
प्लेसमेंट सेल तो बीते कुछ वर्षों में काफी चर्चा में है पर यदि किसी संस्थान से छात्र अच्छे पदों या कंपनी में जाते हैं तो स्वयं उसका नाम हो जाता है। जैसे, हमारे यहां से पढ़े छात्र दुनिया के अलग अलग देशो में उच्च पदों पर हैं, वे अपने संस्थान के बारे में स्वयं बताते हैं। हालांकि बदलते समय के अनुकूल हमने प्लेसमेंट के लिए प्रयास किया है। देश के कार्पोरेट संस्थानों से संपर्क में रहता है। कार्पोरेट रिस्पांसिलिटी प्रोग्राम हो रहा है। अब कंपनियों के लिए भी तो यह अच्छा है कि कईदेशों से अच्छे कैंडिडेट उन्हें अपने यहां काम करने वाले मिल जाते हैं।
आप वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को लेकर क्या सोचते हैं?
सीजीपीए में अधिक लाकर भी बच्चा यदि जीवन-कौशल व मूल्यों से वंचित है तो इसका कोई लाभ नहीं। इसलिए थोड़ा लचीलापन लाना होगा। जैसे नई शिक्षा नीति में इंजीनियरिंग के बच्चों को भी बाहर जाकर दूसरे विषयों में पढ़ने की छूट है। इसलिए हमने प्रयास किया है कि साइंस का छात्र केवल फिजिक्स, केमिस्ट्री ही क्यों पढ़े, उसके साथ सोशल साइंसेज और उसकी पसंद के विषयों को भी पढ़ने का मौका दिया जाएगा। यदि वह आनलाइन पढ़ना चाहता है तो वो भी पढ़ सकता है। हालांकि कितनी यूनिवर्सिटी ऐसा कर रही है यह देखने वाली बात है।
शिक्षा व्यवस्था को समयानुकूल बनाने के लिए क्या करें?
हावर्ड में एक केस स्टडी हुई। इसमें प्रोफेसर ने कक्षा आने के बाद एक प्लास्टिक बोतल रखकर पूछा कि हम खाली प्लास्टिक बोतल से क्या कर सकते हैं? इस सवाल के बाद सभी बच्चे अपने स्तर पर जुट गए। ऐसे सवालों से बच्चों को खुली छूट मिलती है कि वे स्वयं सोचें और अपनी तरफ से कुछ नया निर्माण करें। यह अध्ययन दुनिया में प्लास्टिक के पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव से बचाव के संदर्भ में था। सभी विषय आपस में जुड़े हैं, यह समझ विकसित होनी चाहिए। नई शिक्षा नीति में अपना अहम योगदान देने वाले मंजूल भार्गव का उदाहरण है। एक महान गणितज्ञ के साथ वे बेहतरीन संगीत का ज्ञाता भी हैं। इसी तरह, महान वैज्ञानिक सीवी रमन भी वीणा बजाते थे। उन्होंने अपने रिसर्च पेपर में लिखा कि कटहल की लकड़ी से वीणा बनाई जाए तो अच्छा होगा। यह बताता है कि बच्चे को सभी विषयों का ज्ञान हो। संगीत, विज्ञान ही नहीं अपने परिवेश की अच्छी समझ हो।
सार्क नहीं दक्षिण एशियाई यूनिवर्सिटी कहिए
हालांकि इस यूनिवर्सिटी की परिकल्पना सार्क देशों के अध्यक्ष रहते हुए भारत ने की थी और सभी आठ देश इसके सदस्य बने। पर समय के साथ सार्क की अवधारणा का क्षरण हो रहा है। इसलिए हम चाहते हैं कि दक्षिण एशियाई यूनिवर्सिटी के रूप में इसे जाना जाए ताकि इसका दायरा दक्षिण एशिया के बाकी देशों जैसे, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि भी इस संस्थान का लाभ ले सकें।
कुछ प्रमुख कोर्स
- इंटीग्रेटेड बीबीए-एमबीए
- इंटिग्रेटेड बीएस-एमएस (इंटर-डिसिप्लिनरी साइंसेज)
- बीटेक मैथमेटिक्स एंड कंप्यूटिंग, साइबर सिक्योरिटी में बीटेक
- कामकाजी और प्रफेशनल लोगों के लिए दो साल का एग्जीक्यूटिव एमबीए कोर्स शुरू किया जा रहा है।
- कंप्यूटर साइंस, इकनामिक्स, लीगल स्टडीज, इंटरनैशन स्टडीज, सोशियोलोजी, मीडिया, आर्ट्स एंड डिजाइन, फिजिक्स, क्लाइमेट चेंज में पीएचडी के लिए भी आवेदन कर सकते हैं।
दाखिला कैसे लें?
साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में प्रवेश के लिए भारत समेत इसके दूसरे देशों में राष्ट्रीय स्तर के एंट्रेंस टेस्ट को महत्व दिया जाता है। भारत में जेईई मेन, सीयूईटी, कैट का स्कोर मान्य होता है। यूनिवर्सिटी भी एंट्रेंस टेस्ट का आयोजन करती है। यह छात्र पर निर्भर करता है कि वह कौन से स्कोर के आधार पर यहां दाखिला लेना चाहता है। अधिक जानकारी के लिए आप एसएयू की आफिशियल वेबसाइट https://sau.int को देख सकते हैं।





