मौदहा – हमीरपुर। वक्फ अधिनियम तथा शरियत के स्पष्ट प्रावधानों के बावजूद कई स्थानों पर वक्फ संपत्तियों पर पारिवारिक मालिकाना हक़ का दावा और ‘बाप के बाद बेटा’ की परंपरा का दुरुपयोग देखने को मिल रहा है। जबकि विशेषज्ञों के अनुसार वक्फ-अलल-खैर का मूल उद्देश्य जनहित और समाज की भलाई है तथा वक्फ की संपत्ति किसी व्यक्ति या परिवार की मिल्कियत नहीं मानी जाती।
जानकार बताते हैं कि वक्फ इस्लाम के नजरिये में ऐसा नेक अमल है जिसमें किसी माल को अल्लाह की मिल्कियत में दर्ज कर दिया जाता है और उसका फायदा अवाम को मिलना चाहिए। ऐसे में मुतवल्ली का दर्जा सिर्फ अमीन यानी प्रबंधक का होता है, मालिकाना हक़ का नहीं। वक्फ अधिनियम, 1995 भी इसी सिद्धांत पर आधारित है जिसमें मुतवल्ली को जायदाद का मालिक न मानते हुए केवल देखभाल एवं व्यवस्थापन का अधिकार दिया गया है।
कानून के जानकारों के मुताबिक मुतवल्ली के पास वक्फ संपत्ति को दीर्घकालिक लीज (तवील इजारा) देने, विरासत में स्थानांतरण या तवील कब्ज़े जैसे अधिकार नहीं हैं। वक्फ एक्ट में यह भी स्पष्ट है कि मुतवल्ली की नियुक्ति वक्फ बोर्ड की निगरानी में होती है तथा शिकायत या दुर्व्यवहार की स्थिति में उसे हटाया भी जा सकता है। अधिनियम की धारा 64 मुतवल्ली को हटाने के विस्तृत प्रावधान प्रदान करती है।
विशेषज्ञों ने बताया कि ‘‘बाप के बाद बेटा स्वतः मुतवल्ली होगा’’ जैसी धारणा कानून और शरियत दोनों के अनुसार सही नहीं है। केवल तभी यह व्यवस्था लागू हो सकती है जब वाकिफ़ ने वक्फनामे में स्पष्ट रूप से ऐसी शर्त जोड़ी हो, वह भी प्रशासनिक दृष्टि से, न कि मालिकाना हक़ के रूप में।
समाजसेवियों ने चिंता जताते हुए कहा कि आज कई जगह वक्फ की जायदाद को रसूख और पद प्राप्ति का जरिया बना दिया गया है, जबकि वक्फ-अलल-खैर का मूल मकसद समाज सेवा, गरीबों की मदद, दीन व इल्म की तरक्की और अवाम के कल्याण के लिए संपत्ति का उपयोग है। विशेषज्ञों ने वक्फ बोर्डों से अपील की है कि ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई करते हुए वक्फ की मूल रूह और उद्देश्य की रक्षा सुनिश्चित की जाए।





