प्राकृतिक-न्याय के विपरीत पारित आदेश शून्य : विजय कुमार पाण्डेय

एक्स नर्सिंग असिस्टेंट शेख इब्राहीम को पाकिस्तानी एजेंट के आरोप से सेना कोर्ट लखनऊ के न्यायमूर्ति डी०पी०सिंह ने मुक्त किया । प्रकरण यह था कि जनपद-अमेठी उत्तर-प्रदेश निवासी शेख इब्राहिम वर्ष 1985 में सेना की मेडिकल कोर में भर्ती होकर वर्ष 1991 में नायक बना , जब वह मध्य-कमान लखनऊ में सेवारत था तो सूबेदार लल्लन प्रसाद ने ताज मुहम्मद शेख उर्फ तेजा से उसकी मुलाकात कराई जो कि पाकिस्तानी जासूस था, जिसे उसने एक सुरक्षा से जुड़ी गोपनीय टेलीफोन डायरेक्टरी दी, ऐसा सेना ने आरोप लगाया । यह भी आरोप लगाया गया कि तीन हजार रुपए लेकर आरोपी ने टेलेफोन डारेक्टरी ताज मोहम्मद को दी थी लेकिन ताज ने इससे इंकार किया जब कि मैन्युअल ऑफ़ हैन्डिंग ऑफ़ क्लासिफाइड दकुमेंट्स, 2001 के पैरा-12 B(iv) के अनुसार कर्नल जी.एस. या इसके बराबर के अधिकारी की देख-रेख में यह डोकुमेंट रहना चाहिए l मामले के सुनवाई करते हुए कोर्ट को ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि कोर्ट आफ इन्क्वायरी और समरी ऑफ एविडेंस के आधार पर कारण बताओ नोटिस रुल-17 के तहत जारी करके सेना अधिनियम की धारा 20 (3) के तहत 31 जनवरी 2003 को बर्खास्त करते हुए अपील भी 15 जून 2004 को ख़ारिज कर दी गई l
ए.ऍफ़.टी.बार एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी विजय कुमार पाण्डेय ने कहा कि याची के अधिवक्ता रोहित कुमार की जोरदार दलील सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि दस्तावेजों को देखने से स्पष्ट होता है कि कोर्ट आफ इन्क्वायरी और समरी ऑफ एविडेंस हवलदार क्लर्क राम देव त्रिपाठी एवं अन्य के विरुद्ध हुई थी याची के मामले में नहीं लेकिन अन्य में शामिल लोगों के नाम नहीं दिए गए रहा सवाल रुल-180 का तो उसका अनुपालन भी याची के मामले में नहीं हुआ और कारण बताओ नोटिस जारी करने और बर्खास्त करने का अधिकार सेना नियम 13 (3), आयटम नंबर 3 (v) के तहत ब्रिगेडियर या सब एरिया कमांडर को है जबकि याची के मामले में कर्नल रैंक के अधिकारी द्वारा यह जारी हुआ है जो सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के विपरीत है जबकि भारत सरकार के अधिवक्ता अमित जायसवाल ने इसका जोरदार विरोध करते हुए रोमेश कुमार शर्मा मामले का उद्धरण भी दिया लेकिन सुप्रीम-कोर्ट की सुनिश्चित व्यवस्था के आलोक में इसे सिरे से ख़ारिज कर दिया l विजय कुमार पाण्डेय ने बताया कि सेना कोर्ट ने ऐसी कार्यवाही को बहादुर सिंह लाखुभई गोहिल में गई सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के आलोक में अल्ट्रा-वायरस करार दिया और कारण बताओं नोटिस को शून्य माना और कोर्ट ने कहा कि बर्खास्तगी आदेश विस्तार से कारण बताए बगैर संक्षिप्त में जारी किया गया जो कि सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था और प्राकृतिक-–न्याय के विपरीत है जो क़ानूनी-प्रक्रिया का भाग बन चुका है और इसमें यह भी उल्लिखित नहीं है कि आरोपी ने स्वयं टेलेफोन डायरेक्टरी दी इससे यह तथ्य प्रमाणित होता है कि आरोपी का इससे कोई संबंध नहीं था l सेना कोर्ट ने कहा सत्र-न्यायलय में वर्ष 2001 में ताज मोहम्मद, राम देव यादव समीम अहमद खान और राम कृष्णन के.अय्यर का आई.पी.सी. की धारा- 121-A और 124-A के तहत ट्रायल हुआ जिसमे संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया गया लेकिन न्यायलय ने इस पर अपनी असहमति व्यक्त की लेकिन भारत सरकार के अधिवक्ता अमित जायसवाल इसके विरुद्ध अपील की जानकारी कोर्ट को नहीं दे पाए कोर्ट ने कहा कि यह मामला अपील के लिए उपयुक्त था l सेना कोर्ट के न्यायमूर्ति डी.पी.सिंह ने तथ्यों, गवाहों, साक्ष्यों, विधिक-व्यवस्था एवं सांविधिक आधार पर निर्णय सुनाते हुए सेना द्वारा जारी बर्खास्तगी आदेश को निरस्त करते हुए सेना के सभी लाभ याची को देने को कहा l
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