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सावन माह में शुक्ल पंचमी की मान्यता नागपंचमी के रूप में है। भगवान शिव के गले लिपटे नाग देव के दर्शन और उनकी पूजा आराधना का यह पर्व शुक्रवार को मनाया जायेगा। इस दिन नागदेव को दूध अर्पित कर श्रद्धालु रक्षा की कामना करेंगे। मंदिरों में सर्प दोष निवारण के लिये विशेष पूजन किया जाता है। इस पर्व को गुड़िया नाम से भी जाना जाता है। गांव शहरों के तालाबों, झीलों व नदी, नहरों में लड़कियां कपड़ों की बनी गुड़िया डालती, फिर उन्हे लड़के सजे संवरे डंडे से पीटते है। इस पर्व पर जगह-जगह दंगल और मेला

लगता है। सावन मास में शिव के गणों की भी पूजा की जाती है। उल्लेखनीय है कि सावन शुक्ल पंचमी व षष्ठी यदि एक ही दिन मिल रही हो तो नागदेव प्रसन्न होते है। इस बार ऐसा ही संयोग बन रहा है। इस बार नागपंचमी 28 जुलाई को मनाई जायेगी।
इसलिये मनाते है नागपंचमी पर्व
छतरसा के ज्योतिषाचार्य जगदीश द्विवेदी के अनुसार पंचमी तिथि 27 जुलाई को सुबह 9 बजकर 40 मिनट पर लग रही है, जो 28 जुलाई को 9 बजकर 15 मिनट तक रहेगी। इस बार नागपंचमी पर शिव योग का दुर्लभ संयोग होगा। नागपंचमी व्रत-पूजन, कथा श्रवण या पाठ करने वाला समस्त व्याधो से छूट जाता है।
पंचमी पूजा 12 वर्ष करनी चाहिए। पांच फन वाले नाग का पंचोपचार पूजन, द्वादश नाग नाम अनंत, वासुकी, शेष, पद्म्न, कम्बल, करकोटक, अश्वतर, धृतराष्ट्र, शंखपाल, कालिय, तक्षक व पिंगल आदि नामों का मंत्र जप करना चाहिए। दूध व लावा मिश्री का भोग लगाए। मुख्य द्वार के दोनों तरफ नागदेव की मूर्ति-चित्र स्थापना करना चाहिये।
गुड़िया पीटने की क्या कहानी जानिए
कहते हैं कि गरुण नागों के दुश्मन होते है। प्राचीन कहानी है एक बार गरुण से बचते हुये एक नाग ने महिला से याचना की, कि वह उसे कहीं छिपा ले। जिससे वह गुरु के प्रकोप से बच जाये। महिला ने गरुण को छिपा लिया लेकिन यह बात उसके पेट में नहीं रुकी। उसने अन्य लोगों को भी बता दी। इस बात को सुन क्रोधित हुये नागदेव ने महिला को श्राप दिया कि साल में एक दिन तुम सब पीटी जाओगी। सदियों पुरानी यह प्रथा आज भी एक पर्व के रूप में निभाई जा रही है। औरत के प्रतीक कपड़े से बनी गुड़िया को युवतियां पानी के पास या चौराहे पर फेंकती है और लड़के उनकी पिटाई करते है।
चौरसिया समाज के लिये खास पर्व
नागपंचमी के दिन चौरसिया समाज के लोग नागदेव की विशेष पूजा करते है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान निकले अमृत का नारी स्वरूप में भगवान विष्णु ने वितरण किया था। देवताओं की लाइन में असुर भी थे। इस बीच एक नाग कन्या की मृत्यु हो गई। भगवान विष्णु ने उसकी समाधि बनाई और उस पर बेल लगा दी। इसके बाद से भीट पर पान की खेती होने का प्रचलन शुरू हो गया। जो आज भी अनवरत जारी है। कहा जाता है कि ऋषि कश्यप के पुत्रों को चौऋषि कहा जाता था, जिसे चौरसिया कहा जाने लगा। पान की खेती करने वाले किसान बारिश में सांप से जानमाल की रक्षा के लिये पूजा करते है। इस समाज के लोग पान के भीट और घरों मे सांप का पूजन करेंगे।

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