गवाहों को सिखाने, बरगलाने और लालच देने का आरोप हुआ बेबुनियाद साबित : विजय कुमार पाण्डेय

कर्नल मुकुल सिंघल का सीवियर रिप्रिमांड सेना कोर्ट के न्यायमूर्ति डी.पी.सिंह ने निरस्त करते हुए वेतन, प्रमोशन, सीनियारिटी एवं अन्य सभी लाभ देने का आदेश पारित किया । प्रकरण यह था कि कर्नल मुकुल सिंघल 27 दिसम्बर 2010 को सेन्ट्रल आर्डिनेंस डिपो आगरा में डिप्टी कमान्डेंट के पद पर तैनात थे उन्हें 16 अप्रैल 2011 को अस्थायी ड्यूटी पर पुलगावं, महाराष्ट्र स्थिति सेन्ट्रल एमुनेशन डिपो भेजा गया उन पर आरोप यह लगा कि उनकी अनुपस्थिति में डीलर पवन कुमार जैन ने नीलाम किए गए मलवे को 18 अप्रैल को उठाया जिसे सेना के खुफिया विभाग ने पकड़ा तो निर्धारित मात्रा से 41 टन अधिक पाया, 30 जून से 13 अगस्त तक कोर्ट आफ इन्क्वायरी में करीब 30 गवाह उपस्थित हुए जिसमें सेना रुल 180 के तहत आरोपी भी उपस्थित हुआ और उसे सुना गया ऐसा भारत सरकार के अधिवक्ता डा.चेत नारायण सिंह ने कोर्ट को बताया लेकिन याची के अधिवक्ता आर. चन्द्रा ने इसे मानने से इनकार कर दिया, इसके बाद सेना रुल 37 के आलोक में जनरल कोर्ट मार्शल करके सेना की धारा 63 और भारतीय दण्ड-संहिता की धारा 34 के तहत छः आरोप तय हुए लेकिन चार आरोप तय नहीं हो पाए, दो आरोप में उसे सीवियर रिप्रिमांड, तीन वर्ष का पेंशन में फोरफीच्र्र किया गया जिसके विरुद्ध सेना कोर्ट कोलकाता में धारा-14 के तहत मुकदमा दायर किया जो वर्ष 2017 में सेना कोर्ट लखनऊ सुनवाई हेतु स्थानांतरित कर दी गई l
ए.ऍफ़.टी.बार एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी विजय कुमार पाण्डेय ने बताया कि आरोप संख्या-6 पर केवल चार बिन्दुओं पर याची के अधिवक्ता ने जोरदार बहस कि पहला सेना-नियम- 180, दुसरा, साक्ष्य का अभाव, तीसरा, इस सिलसिले में हुई मीटिंग में याची का न होना और चौथा, आरोप अस्पष्ट, एकतरफ और आधारहीन है, सरकार के अधिवक्ता डा.चेत नारायण सिंह ने सेना का बचाव करते हुए मुक्कियाह बनाम तमिलनाडु एवं भारत सरकार बनाम ए.हुसैन का हवाला देते हुए दलील दी की स्तरहीन व्यवहार की सजा छोटी दी गई है इसलिए मामले को खारिज किया जाय लेकिन न्यायमूर्ति डी.पी.सिंह नें गवाह संख्या-7 और 21 सूबेदार के.के.शर्मा के बयान के आधार पर कहा कि 23 मई को होने वाली कांफ्रेंस में शामिल होकर याची ने गुनाह नहीं किया, सेना नियम-180 का पालन तो किया गया लेकिन जिस तरह से किया गया उसे न्यायिक दृष्टिकोण से उचित नहीं माना जा सकता क्योंकि याची कोर्ट आफ इन्क्वायरी के अंत में आया जो विधायिका के पारदर्शी और फेयर नजरिये और मेजर जनरल इन्द्रजीतकुमार बनाम भारत सरकार और सुरेन्द्र कुमार साहनी बनाम चीफ आफ आर्मी स्टाफ के विरूद्ध है l विजय कुमार पाण्डेय ने बताया कि कोर्ट ने इसे बगैर साक्ष्य का प्रकरण माना क्योंकि कांफ्रेंस में ऐसा कुछ उसके विपरीत नहीं था, छठे आरोप का प्रमुख गवाह हवलदार साहेब सिंह ने ऐसा कुछ भी बयान नहीं दिया है जिससे आरोप तय हो सके जो कि ज्ञान दीन और त्रिवेणी रबर के मामले में सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के विपरीत है l सेना कोर्ट ने कहा कि आरोप-पत्र सही तरीके से नहीं बनाया गया और ऐसे अस्पष्ट आरोप से किसी को भी अपना बचाव करने में दिक्कत होगी और ऐसा करने के पीछे की मंशा समझ से परे है और इसे रायफलमैन सुरिन्दर कुमार बनाम भारत सरकार और कमांडर हरनीत सिंह बनाम भारत सरकार में दी गयी सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के विपरीत माना और कहा कि घटना के दिन आरोपी बाहर था और 41 टन का मलवा कमांडेंट की नाक के नीचे से गायब हुआ, गवाहों को सिखाने, बरगलाने और लालच देने का आरोप बेबुनियाद है इसलिए याची को मानसिक प्रताड़ना के लिए पचास हजार रुपया सेना याची को देते हुए वेतन, प्रमोशन, वरिष्ठता एवं अन्य अनुलाभ दे और रु.25000/ बार को अदा करे l
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