Tuesday, March 24, 2026
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LNG की भारत में किल्लत क्यों, कैसे की जा रही इसकी भरपाई; LPG से कितनी अलग है ये गैस; CNG-PNG इसी का नाम

भारत LNG की किल्लत का सामना कर रहा है, जिसका मुख्य कारण पश्चिमी एशिया से आयात पर निर्भरता और मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष है। कतर की रास लफान रिफाइनरी पर हमले से आपूर्ति बाधित हुई है।

भारत सिर्फ LPG नहीं, बल्कि LNG की किल्लत का भी सामना कर रहा है। क्योंकि इस गैस के लिए भी हम आयात पर निर्भर हैं। भारत अपनी जरूरत का 50 फीसदी लिक्विफाइड नेचुरल गैस (Liquefied Natural Gas) पश्चिमी एशिया से आयात करता है। लेकिन मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष की वजह से एलएनजी का आयात प्रभावित हुआ है।

गैस और तेल से लदे जहाज ईरान के स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने के चले आवाजाही नहीं कर पा रहे हैं। ईरान के हमले से कतर की सबसे बड़ी LNG रिफाइनरी रास लफान (Ras Laffan) का प्रोडक्शन बाधित हुआ है। भारत अपनी LNG की जरूरत का अधिकतर हिस्सा यहीं से मंगाता है।

भारत पर इसका क्या असर पड़ रहा है, और हम इससे कैसे निपट रहे हैं और LNG कैसे LPG से अलग है? जानेंगे इन सभी सवालों के जवाब जागरण बिजनेस के इस एक्सप्लेनर में।

युद्ध ने कैसे दुनिया की LNG सप्लाई बाधित किया?

दुनिया की 20 फीसदी LNG सप्लाई स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से आती है। लेकिन 28 फरवरी 2026 से शुरू हुए संघर्ष ने यहां से होने वाली सप्लाई को बाधित किया। कतर के रास लफान रिफाइनरी और कतर एनर्जी के LNG प्रोजेक्ट पर हुए हमले ने इसके प्रोडक्शन और कैपेसिटी को बहुत कम कर दिया।

कतर एनर्जी के CEO साद शेरिदा अल काबी ने कहा, “इस हमले ने कतर से होने वाली LNG एक्सपोर्ट को 17 फीसदी तक कम कर दिया। इतना ही नहीं, इसकी वजह से रेवेन्यू में सालाना लगभग 200 बिलियन डॉलर का नुकसान होगा। इस हमले की वजह से हुए इन्फ्रास्ट्रक्चर को बनाने में 5 साल का समय लग सकता है।”

LNG सप्लाई के लिए भारत दूसरे देशों पर कितना निर्भर?

भारत ने वित्त वर्ष 2025 में लगभग 27 मिलियन टन एलएनजी इंपोर्ट (India LNG Import Data) की थी। इसके लिए भारत ने 14.9 बिलियन डॉलर खर्च किए थे।भारत की अपनी जरूरत का 40 से 45 फीसदी एलएनजी कतर और अन्य पश्चिमी एशियाई देशों से आयात करता है। भारत अपनी प्राकृतिक गैस की जरूरत का लगभग आधा हिस्सा खुद ही प्रोड्यूस करता है। लेकिन प्रोडक्शन का अधिकतर हिस्सा सिटी गैस की डिस्ट्रीब्यूशन में इस्तेमाल हो जाता है। इसलिए फर्टिलाइजर, स्टील और पावर सेक्टर में इस्तेमाल होने वाली जरूरत को पूरा करने के लिए LNG का इंपोर्ट किया जाता है।

मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष की वजह से एनर्जी के लिए आयात पर निर्भर रहने वाले भारत समेत अन्य देशों में LNG की सप्लाई बाधित हुई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने और कतर एनर्जी की रिफाइनरी पर हमले की वजह से इसका असर कंज्यूमर को होने वाली सप्लाई पर साफ दिख रहा है।

भारत सरकार ने घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए इंडस्ट्रियल और फर्टिलाइजर प्लांट की सप्लाई में कटौती की है। फर्टिलाइजर को जरूरत का सिर्फ 70 फीसदी एलएनजी दी जा रही है। वहीं, दूसरे इंडस्ट्रियल सेक्टर जैसे चाय और अन्य उद्योगों को जरूरत का 80% एलएनजी मिल रहा है।

भारत ने LNG की जरूरतों को पूरा करने के लिए डायवर्सिफाई किया आयात

भारत ने घरेलू जरूरतों की सप्लाई को प्राथमिकता पर रखा है। इसके अलावा LNG के आयात को डायवर्सिफाई भी किया है। भारत ने ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, अल्जीरिया से LNG के बड़े ट्रेडिंग फर्म से आयात बढ़ा दिया है, ताकि घरेलू जरूरतों को पूरा किया जा सके।

इसके साथ भारत अपनी घरेलू एलएनजी प्रोडक्शन को बढ़ाने पर भी जोर दे रहा है। संसद की एक रिपोर्ट में बताया गया कि भारत के पास 1.4 ट्रिलियन क्यूबिक मैट्रिक टन नेचुरल गैस का रिजर्व है। इसके अलावा 4.5 बिलिनय बैरल का कच्चे तेल का रिजर्व भी है।

LPG और LNG में क्या है अंतर?

लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) दोनों ही सामान्य तापमान और दबाव पर गैस के रूप में मौजूद होती हैं, और इनके नाम व संक्षिप्त रूप भी मिलते-जुलते हैं, फिर भी ये अपने आप में अलग हैं।

LPG बहुत ही हाई फ्लेमेबल गैस होती है। यह हाइड्रोकार्बन गैसों के मिश्रण से बनी होती है। प्रोपेन या ब्यूटेन के नाम से भी इसे जाना जाता है। जब कारखानों में कच्चे तेल (Crude Oil) से पेट्रोल और डीजल बनाया जा रहा होता है, तब LPG एक सह-उत्पाद (by-product) के रूप में निकलती है।

जब जमीन से प्राकृतिक गैस निकाली जाती है, तो उसमें मीथेन के साथ-साथ कुछ भारी गैसें भी होती हैं। इन्हें गैस से अलग कर लिया जाता है। यह अलग की गई गैस प्रोपेन (Propane) और ब्यूटेन (Butane) गैसें होती हैं। यह वही गैस है जो हमारे घरों में खाना पकाने वाले सिलेंडरों में भरी जाती है।

वहीं, बात करें LNG की तो जमीन या समुद्र के नीचे से प्राकृतिक गैस (Natural Gas) निकाली जाती है, तो उसे साफ किया जाता है। इस सफाई के दौरान उसमें से पानी, कार्बन डाइऑक्साइड, और अन्य भारी गैसों (जैसे LPG वाली गैसें – प्रोपेन और ब्यूटेन) को बाहर निकाल दिया जाता है।

सफाई के बाद जो गैस बचती है, वह लगभग शुद्ध मीथेन (Methane) होती है। इस मीथेन गैस को एक जगह से दूसरी जगह जहाजों में भरकर ले जाने के लिए बहुत ज्यादा ठंडे तापमान (लगभग -162°C) पर ठंडा किया जाता है, जिससे यह सिकुड़ कर तरल (Liquid) बन जाती है। इसी तरल रूप को LNG कहते हैं। इसे जब गाड़ियों में डाला जाता है तो इसे CNG कहा जाता है। यानी सिलिंडर में कंप्रेस करके भर दिया जाता है और वहीं, जब जब पाइप के जरिए इसकी सप्लाई घरों में की जाती है तो इसे PNG कहते हैं।

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