इटवा सिद्धार्थनगर। स्वास्थ्य विभाग से जुड़े संविदा कर्मियों ने नेता प्रतिपक्ष से मुलाकात की। उन्होंने अपनी समस्याओं को लेकर एक ज्ञापन सौंपा और विधानसभा में इस मुद्दे को उठाने का अनुरोध किया। कर्मचारियों ने अपनी नौकरी के स्वतः नवीनीकरण की मांग की, आरोप लगाया कि उनका शोषण किया जा रहा है और उन्हें मनमाने ढंग से नौकरी से निकाला जा रहा है।
संविदा कर्मियों ने बताया कि उत्तर प्रदेश में 25 वर्षों से अधिक समय से ‘एड्स नियंत्रण’ कार्यक्रम में लगभग 1,600 कर्मचारी कार्यरत हैं। उनके अथक प्रयासों के कारण, राज्य में 1,33,000 एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों में से 95 प्रतिशत से अधिक एचआईवी प्रसार से मुक्त हैं।
कर्मचारियों का आरोप है कि इस महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद, उन्हें लगातार शोषण और नौकरी से निकाले जाने का सामना करना पड़ रहा है। विभाग में ‘वार्षिक मूल्यांकन’ प्रणाली का उपयोग करके उन्हें मनमाने ढंग से सेवामुक्त किया जा रहा है। उन्होंने कई उदाहरण भी दिए।
कु० समीक्षा चौधरी, जो पीएचसी सरदारनगर, गोरखपुर में लैब टेक्निशियन के पद पर कार्यरत थीं, उन्हें कभी ड्यूटी पर देरी से आने का नोटिस नहीं मिला, फिर भी मूल्यांकन में कम अंक देकर उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया।
इसी तरह, गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के लैब टेक्निशियन सुरेश गुप्ता के केंद्र को उनके कार्यों की गुणवत्ता के आधार पर 5-स्टार रेटिंग मिली थी, लेकिन उन्हें भी मूल्यांकन पद्धति में कम अंक देकर बाहर कर दिया गया। डॉ. बी. के. गौतम, जो मेडिकल कॉलेज कौशाम्बी में एसटीआई काउंसलर थे, उन्हें एक फर्जी शिकायत के आधार पर बिना स्पष्टीकरण का समय दिए हटा दिया गया।
एक अन्य मामले में, सिद्धार्थनगर के एआरटी केंद्र में डाटा मैनेजर अरुण कुमार त्रिपाठी कोविड काल में एक महीने के लिए दक्षिण भारत में फंस गए थे। उन्होंने उत्तर प्रदेश एड्स नियंत्रण सोसाइटी और स्थानीय अधिकारियों को इसकी सूचना दी थी, और जनपद से उनका मूल्यांकन उत्कृष्ट भेजा गया था।
फिर भी, उन्हें तत्कालीन अधिकारी डॉ. ए. के. सिंघल द्वारा कथित तौर पर जातिगत विद्वेष के कारण नौकरी से निकाल दिया गया। इस मुलाकात के दौरान प्रदेश अध्यक्ष पंकज श्रीवास्तव, राज्य संयोजक रत्नेश त्रिपाठी, विश्वजीत ओझा, प्रदेश प्रभारी प्रशांत अवस्थी, अपूर्व श्रीवास्तव, सुरेश गुप्ता, बी. के. गौतम, अमित मिश्र, जितेंद्र त्रिपाठी सहित कई अन्य कर्मचारी मौजूद रहे।





