लखनऊ। मसूड़ों की पुरानी बीमारी अब केवल दांत और मुंह तक सीमित समस्या नहीं मानी जा सकती। लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के एक अध्ययन में पायरिया यानी क्रॉनिक पीरियोडोंटाइटिस और फेफड़ों की गंभीर बीमारी इंटरस्टिशियल लंग डिजीज (आईएलडी) के बीच संबंध के संकेत मिले हैं।
अध्ययन में शामिल मरीजों की जांच के दौरान सूजन से जुड़े कुछ बायोमार्कर का स्तर अधिक पाया गया। शोधकर्ताओं के मुताबिक, मसूड़ों में लंबे समय तक बनी रहने वाली सूजन और मुंह के हानिकारक बैक्टीरिया शरीर की अन्य प्रणालियों, खासकर फेफड़ों की सेहत को प्रभावित कर सकते हैं।
75 लोगों को किया गया अध्ययन में शामिल
केजीएमयू के पीरियोडोंटोलॉजी विभाग ने रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग और सेंटर फॉर एडवांस्ड रिसर्च के सहयोग से यह अध्ययन किया। इसमें कुल 75 लोगों को शामिल किया गया। इनमें 25 स्वस्थ व्यक्ति, 25 क्रॉनिक पीरियोडोंटाइटिस से पीड़ित और 25 इंटरस्टिशियल लंग डिजीज के मरीज शामिल थे।
शोध के दौरान प्लाक, मसूड़ों की सूजन, पॉकेट की गहराई और दांतों से मसूड़ों के जुड़ाव समेत कई मानकों की जांच की गई। स्वस्थ लोगों की तुलना में बीमारी से प्रभावित समूहों में ये मानक अधिक खराब पाए गए।
लार और खून की जांच में मिले सूजन के संकेत
अध्ययन में मरीजों के लार और खून के नमूनों की भी जांच की गई। इसमें एमएमपी-7 और एमएमपी-8 जैसे सूजन से जुड़े बायोमार्कर का स्तर अधिक मिला, जबकि टीआईएमपी-1 में कोई खास अंतर नहीं पाया गया। इससे मसूड़ों और फेफड़ों की बीमारियों के बीच साझा सूजन संबंधी प्रक्रियाओं की संभावना को बल मिला है।
विशेषज्ञों का मानना है कि खराब ओरल हेल्थ को नजरअंदाज करना शरीर की समग्र सेहत पर असर डाल सकता है। हालांकि, यह अध्ययन संबंध के संकेत देता है और इसे कारण-प्रभाव का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
क्या है इंटरस्टिशियल लंग डिजीज?
इंटरस्टिशियल लंग डिजीज में फेफड़ों के ऊतकों में सूजन और बदलाव हो सकते हैं, जिससे सांस लेने में परेशानी जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसीलिए विशेषज्ञ दांतों और मसूड़ों की नियमित देखभाल तथा समय पर जांच को महत्वपूर्ण मानते हैं।





