बांग्लादेश में आम चुनावों के बाद मुहम्मद यूनुस के भविष्य को लेकर नई बहस छिड़ गई है। अंतरिम प्रशासन के प्रमुख के रूप में उन्होंने शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न कराए और ‘जुलाई चार्टर’ जैसे सुधारों का प्रस्ताव रखा। बीएनपी की नई सरकार बनने के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यूनुस की सुधारवादी विरासत को कितना स्वीकार किया जाता है। नोबेल विजेता यूनुस अब ‘बुजुर्ग स्टेट्समैन’ की भूमिका में उभर सकते हैं।
बांग्लादेश में पिछले एक वर्ष से जारी राजनीतिक उथल-पुथल आम चुनावों के साथ थमती दिख रही है और इसी के साथ अंतरिम प्रशासन के प्रमुख रहे मुहम्मद यूनुस के भविष्य को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
बीते डेढ़ साल में देश की बागडोर संभालने वाले यूनुस ने अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न कराकर राहत की सांस ली है, पर अब उनकी भूमिका क्या होगी यह सवाल राजनीतिक हलकों में प्रमुख है। चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया तेज हो गई है और पार्टी प्रमुख तारिक रहमान के नेतृत्व में नई सरकार बनने की संभावना है।
अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन और राजनीतिक संकट के बीच यूनुस ने विदेश से लौटकर अंतरिम प्रशासन की कमान संभाली थी। उस समय देश में कानून-व्यवस्था, महंगाई और निवेश पलायन जैसी चुनौतियां चरम पर थीं। यूनुस ने खुद को ‘केयरटेकर’ तक सीमित रखा और किसी दलगत राजनीति से दूरी बनाए रखी।
मोहम्मद यूनुस का कार्यकाल
उनके कार्यकाल में प्रशासनिक फेरबदल, चुनावी ढांचे की पारदर्शिता और सुरक्षा प्रबंधन पर विशेष जोर दिया गया, जिसके चलते मतदान अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने प्रक्रिया को विश्वसनीय बताया।सुधारवादी भरोसेमंद की छवि यूनुस की पहचान केवल चुनाव प्रबंधन तक सीमित नहीं रही।
उन्होंने एक सुधारवादी “जुलाई चार्टर” के जरिए दीर्घकालिक संस्थागत बदलावों का खाका पेश किया जैसे प्रधानमंत्री के लिए दो कार्यकाल की सीमा, न्यायपालिका की स्वतंत्रता को मजबूत करना, संसद के दूसरे सदन का गठन, महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना और चुनावों के दौरान निष्पक्ष अंतरिम व्यवस्था।
इन प्रस्तावों पर जनमत संग्रह की पहल ने उन्हें सुधारक की छवि दी, हालांकि आलोचकों ने इसे संवैधानिक बहस का विषय बताया। अब यह देखना अहम होगा कि बीएनपी सरकार इन सुधारों को किस हद तक स्वीकार करती है, क्योंकि इसी से यूनुस की राजनीतिक विरासत तय होगी।
विदेश नीति में यूनुस ने साधा संतुलन विदेश नीति के स्तर पर बांग्लादेश की रणनीतिक स्थिति भारत, चीन और अमेरिका के बीच संतुलन की मांग करती है। यूनुस ने अपने कार्यकाल में अपेक्षाकृत संतुलित रुख अपनाया; अब यही जिम्मेदारी नई सरकार पर होगी कि वह क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा के बीच निवेश, आपूर्ति-श्रृंखला और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में बहुपक्षीय सहयोग बनाए रखे।
दूर रहकर भी प्रभाव रख सकते हैं यूनुस
85 वर्षीय यूनुस, जो ग्रामीण बैंक की स्थापना और माइक्रोफाइनेंस माडल के लिए नोबेल सम्मान पा चुके हैं, अब सक्रिय सत्ता से हटकर “बुजुर्ग स्टेट्समैन” की भूमिका में उभर सकते हैं। वह ऐसे मार्गदर्शक बन सकते हैं, जो संस्थागत सुधार और लोकतांत्रिक सुरक्षा उपायों पर नैतिक प्रभाव बनाए रखे।
यह भी संभव है कि वह सार्वजनिक जीवन से दूरी बना लें। फिलहाल इतना तय है कि बांग्लादेश की संक्रमणकालीन राजनीति में उनकी भूमिका एक निर्णायक अध्याय के रूप में दर्ज हो चुकी है, जिसकी अंतिम व्याख्या नई सरकार के कदमों से होगी।
कौन हैं मुहम्मद यूनुस
1940 में चिटगांव में जन्मे यूनुस ने अर्थशास्त्र की पढ़ाई ढाका विश्वविद्यालय से की और बाद में अमेरिका की वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी से पीएचडी की।1970 के दशक में बांग्लादेश में भयंकर गरीबी और अकाल देखने के बाद उन्होंने पारंपरिक बैंकिंग व्यवस्था से अलग रास्ता अपनाया।
1983 में ग्रामीण बैंक की स्थापना की, जिसका उद्देश्य गरीबों खासकर महिलाओं को बिना जमानत छोटे कर्ज (माइक्रोफाइनेंस) देना था।माइक्रोक्रेडिट माडल सफल हुआ और लाखों लोगों को स्वरोजगार का अवसर मिला, जिससे उनकी अंतरराष्ट्रीय पहचान बनी। 2006 में उन्हें और ग्रामीण बैंक को संयुक्त रूप से नोबेल शांति पुरस्कार मिला, जिससे वे वैश्विक स्तर पर सामाजिक बदलाव के प्रतीक बन गए।





