ईरान संघर्ष से उभरती अर्थव्यवस्थाओं को तेल-गैस आयात, विदेशी मुद्रा और विनिमय दर में अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
रेटिंग एजेंसी फिच ने सोमवार को कहा कि ईरान से जुड़े संघर्ष के कारण उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए तेल-गैस आयात, प्रवासी समुदाय की तरफ से भेजी जाने वाली विदेशी मुद्रा और विनिमय दर (एक्सचेंज रेट) जैसे क्षेत्रों में अतिरिक्त चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।
फिच ने कहा कि ऊर्जा कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहने से उन सरकारों पर वित्तीय दबाव बढ़ सकते हैं, जो उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए ईंधन पर सब्सिडी देती हैं या कीमतों में बढ़ोतरी के जवाब में ऐसी योजनाएं शुरू करती हैं।
वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान
फिच रेटिंग्स ने ‘ईरान संघर्ष से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए उपजे नए ऋण जोखिम’ शीर्षक वाली रिपोर्ट में कहा कि यदि खाड़ी क्षेत्र से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में अपेक्षा से अधिक व्यवधान आता है तो वैश्विक निवेशकों की धारणा पर गंभीर असर पड़ सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसी स्थिति में डालर मजबूत हो सकता है और खासकर उच्च जोखिम वाले उधारकर्ताओं के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कर्ज जारी करना मुश्किल हो सकता है। फिच ने कहा, ‘ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई पर भी दबाव बढ़ेगा और इससे दुनियाभर में मौद्रिक नीति के फैसलों पर असर पड़ सकता है।’
शुद्ध जीवाश्म ईंधन आयात
रिपोर्ट के मुताबिक, तेल और गैस आयात पर इस संघर्ष का सबसे सीधा असर देखने को मिलेगा। इसकी वजह यह है कि भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुद्ध जीवाश्म ईंधन आयात सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के तीन प्रतिशत या उससे अधिक के बराबर है।
रेटिंग एजेंसी ने कहा कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते तेल एवं गैस का परिवहन एक महीने से कम समय तक बंद रहता है और क्षेत्र के तेल उत्पादन ढांचे को बड़ा नुकसान नहीं होता है तो उभरती अर्थव्यवस्थाओं की साख पर जोखिम सीमित रह सकता है।
हालांकि लंबे समय तक यह व्यवधान कायम रहने की स्थिति में असर ज्यादा गंभीर हो सकता है। आयात की लागत बढ़ने से पाकिस्तान जैसे उन देशों पर दबाव अधिक होगा जिनकी वित्तीय क्षमता पहले से कमजोर है या जिनका चालू खाता घाटा अधिक है।





