होर्मुज जलडमरूमध्य में नाकाबंदी ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला दिया है, जिससे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं। यह जलमार्ग वैश्विक तेल, एलपीजी और एलएनजी व्यापार का बड़ा हिस्सा संभालता है, जिसका एशिया पर गहरा असर पड़ा है।
ईरान के साथ चल रहे अमेरिका-इजरायल संघर्ष के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में लगी नाकाबंदी ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला के रख दिया है।
यह संकरा जलमार्ग, जो ईरान और ओमान के बीच फैला है, वैश्विक तेल का 20 प्रतिशत, एलपीजी का 29 प्रतिशत और एलएनजी का 19 प्रतिशत हिस्सा संभालता है।
इसका ज्यादातर व्यापार एशिया की तरफ होता है। हालिया तनाव में जहाजों की आवाजाही घटकर करीब 90 रह गई है, इसमें ज्यादातर ईरानी क्रूड चीन जा रहा है। इससे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं, जिससे रिफाइनरियां बंद होने लगी हैं।
एशिया और यूरोप पर भारी असर
एशिया इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित है। चीन, भारत, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों की ऊर्जा निर्भरता होर्मुज पर टिकी है। भारत का 14.7 प्रतिशत क्रूड इसी रास्ते से आता है।
अगस्त 2025 से फरवरी 2026 तक भारत ने 61.4 अरब डॉलर का क्रूड आयात किया, जिसमें सऊदी अरब, इराक और यूएई प्रमुख सोर्स थे। एलपीजी आयात का 90 प्रतिशत और एलएनजी का 50 प्रतिशत से अधिक इसी जलडमरूमध्य से होता है।
पाकिस्तान का एलएनजी आयात 99 प्रतिशत तक प्रभावित है। यूरोप भी जेट फ्यूल के 50 प्रतिशत से अधिक और डीजल के 20 प्रतिशत के लिए निर्भर है।
इस बीच रिफाइनरियां 20-30 प्रतिशत उत्पादन घटाने पर विचार कर रही हैं। अफ्रीका के रास्ते जहाजों को घुमाने से समय और लागत बढ़ रही है, जिससे स्टैगफ्लेशन का खतरा मंडरा रहा है।
अमेरिका कम रहा लाभ?
अमेरिका इस संकट से लगभग अछूता है और बल्कि मुनाफा कमा रहा है। अमेरिका ऊर्जा आत्मनिर्भर है। इसकी क्रूड आयात 0.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन से कम है, ज्यादातर कनाडा से पाइपलाइन के जरिए ही होती है।
एलपीजी और एलएनजी आयात शून्य है, जबकि डिस्टिलेट्स का हिस्सा 0-0.5 प्रतिशत मात्र है। ऊंची तेल कीमतें शेल उत्पादन को फायदेमंद बनाती हैं। एशियाई देश अमेरिकी एलपीजी और एलएनजी की ओर रुख कर रहे हैं।
भारत ने अमेरिका से 2.2 मिलियन टन एलपीजी का सौदा किया है, जबकि यूरोप अमेरिकी एलएनजी खरीद बढ़ा रहा है। अमेरिकी रिफाइनर सस्ते घरेलू क्रूड से ऊंचे प्रोडक्ट बनाकर निर्यात कर रहे हैं।





