शमीम निख़त उर्दू फ़िक्शन अवॉर्ड डॉ. सबीहा अनवर और वक़ार रिज़वी पत्रकारिता अवॉर्ड संजय शर्मा को प्रदान
शुआ फ़ातिमा इंटर कॉलेज को डिग्री कॉलेज का दर्जा दिया जाए: डॉ. अम्मार रिज़वी
महज़ नकल किसी साहित्य को महान नहीं बना सकती: प्रो. याक़ूब यावर
लखनऊ। ऑल इंडिया कैफ़ी आज़मी अकादमी में शुआ फ़ातिमा एजुकेशनल वेलफेयर ट्रस्ट के तत्वावधान में हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी डॉ. शमीम निख़त फ़िक्शन अवॉर्ड समारोह अपनी परंपरागत शान-ओ-शौकत के साथ आयोजित किया गया। समारोह की अध्यक्षता उत्तर प्रदेश के पूर्व कार्यवाहक मुख्यमंत्री डॉ. अम्मार रिज़वी ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में मनीष शुक्ला (फाइनेंस कंट्रोलर, परिवहन विभाग, उत्तर प्रदेश) शामिल हुए। कार्यक्रम का संचालन प्रो. अब्बास रज़ा नैयर ने किया।
गुलपोशी और शॉल ओढ़ाकर अतिथियों का स्वागत करने के बाद प्रो. रेशमा परवीन ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। उन्होंने फ़िक्शन अवॉर्ड की पृष्ठभूमि और उसके उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए प्रो. शारिब रुदौलवी, प्रो. शमीम निख़त और वक़ार रिज़वी की सेवाओं को भी याद किया।
इसके बाद इंटीग्रल यूनिवर्सिटी के संस्थापक एवं चांसलर प्रो. सैयद वसीम अख़्तर के हाथों बारहवाँ डॉ. शमीम निख़त उर्दू फ़िक्शन अवॉर्ड-2026 प्रसिद्ध कहानीकार एवं करामत हुसैन मुस्लिम गर्ल्स पीजी कॉलेज, लखनऊ की पूर्व प्राचार्य डॉ. सबीहा अनवर को तथा सैयद वक़ार रिज़वी पत्रकारिता अवॉर्ड वरिष्ठ पत्रकार संजय शर्मा को प्रदान किया गया। संजय शर्मा का अवॉर्ड उनकी पत्नी बबीता चतुर्वेदी ने ग्रहण किया। दोनों पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं के सम्मान में क्रमशः प्रो. रेशमा परवीन (अध्यक्ष, उर्दू विभाग, खुनखुन जी गर्ल्स पीजी कॉलेज, लखनऊ) और डॉ. मोसी रज़ा (असिस्टेंट प्रोफेसर, उर्दू, ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ) ने प्रशस्ति-पत्र पढ़े।
इस अवसर पर ‘उर्दू फ़िक्शन पर वैश्विक फ़िक्शन के प्रभाव’ विषय पर विस्तृत व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए प्रो. याक़ूब यावर (पूर्व अध्यक्ष, उर्दू विभाग, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) ने कहा कि उर्दू फ़िक्शन के परिदृश्य में वैश्विक फ़िक्शन के प्रभाव के तहत सबसे बुनियादी प्रवेश यथार्थवाद का हुआ। यथार्थवाद की मूल और क्रांतिकारी अवधारणा यह थी कि साहित्य का दायित्व है कि वह मानवीय जीवन से गहरा संबंध स्थापित करने का प्रयास करे। उस दौर के फ़िक्शन में समाज महज़ पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि आम तौर पर कहानी का एक सक्रिय पात्र बनकर सामने आता है।
उन्होंने कहा कि अनुवाद ने केवल फ़िक्शन को प्रभावित नहीं किया, बल्कि उर्दू में फ़िक्शन की अभिव्यक्ति के लिए भाषा को तैयार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों और बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में यूरोपीय उपन्यासों के अनुवाद ने उर्दू के रचनाकारों को उपन्यास की विभिन्न कलात्मक विधाओं से परिचित कराया। रूसी और फ्रांसीसी साहित्य के अनुवादों ने भी उर्दू फ़िक्शन की सौंदर्यशास्त्रीय समझ पर गहरा प्रभाव डाला। जिस दौर में उर्दू में आधुनिकता से संबंधित बहसें तेज़ हुईं, उस समय पश्चिमी आधुनिक कहानियों और उपन्यासों के अनुवादों ने उर्दू के फ़िक्शन लेखकों को विशेष रूप से प्रभावित किया। अपनी बात समाप्त करते हुए उन्होंने कहा कि एक क्षेत्र के साहित्य का दूसरे क्षेत्र के साहित्य पर प्रभाव उस समय रचनात्मक शक्ति बनता है, जब वह उसमें समाहित होकर नया रूप धारण करता है। महज़ नकल किसी साहित्य को महान नहीं बना सकती।
डॉ. अम्मार रिज़वी ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में दोनों पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं और कहानी लेखन प्रतियोगिता के विजेता विद्यार्थियों को बधाई देते हुए कहा कि इस कार्यक्रम की शुरुआत प्रो. शारिब रुदौलवी ने दस वर्ष पहले अपनी पत्नी की याद में की थी। आज वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन इसके बावजूद यह कार्यक्रम हर वर्ष उसी गरिमा और शान के साथ आयोजित हो रहा है। इसके लिए ट्रस्ट के पदाधिकारी बधाई के पात्र हैं। साथ ही वे श्रोता और दर्शक भी प्रशंसा के हकदार हैं, जिनकी बड़ी संख्या में उपस्थिति यहां हमेशा बनी रहती है। इससे पता चलता है कि शारिब साहब के प्रति लोगों का प्रेम आज भी कायम है।
अनुवाद के महत्व पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि कैफ़ी आज़मी जैसे संस्थान में एक अनुवाद केंद्र भी स्थापित होना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि शारिब रुदौलवी और शमीम निख़त ने अपनी बेटी शुआ फ़ातिमा की याद में जिस स्कूल की स्थापना की थी, वह आज इंटर कॉलेज बन चुका है, लेकिन अब समय आ गया है कि इस इंटर कॉलेज को डिग्री कॉलेज में परिवर्तित किया जाए। यदि हम सभी पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ प्रयास करें तो यह काम मुश्किल नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि शुआ फ़ातिमा कॉलेज में एक हॉल का निर्माण भी कराया जाना चाहिए, ताकि शमीम निख़त फ़िक्शन अवॉर्ड और शारिब रुदौलवी अवॉर्ड के कार्यक्रम उसी कॉलेज में आयोजित किए जा सकें।
समारोह के मुख्य अतिथि मनीष शुक्ला ने कहा कि प्रो. शारिब रुदौलवी जितने बड़े विद्वान और साहित्यकार थे, उतने ही बड़े इंसान भी थे। उनकी साहित्यिक सेवाओं का दायरा जितना व्यापक था, उनकी मानवीय और सामाजिक सेवाएं भी उतनी ही विस्तृत थीं। शुआ फ़ातिमा स्कूल, जो अब कॉलेज का रूप ले चुका है, गरीब और आर्थिक रूप से कमज़ोर लड़कियों के लिए स्थापित किया गया था। यह संस्थान बेहतर सेवाएं प्रदान कर रहा है और लगातार प्रगति के मार्ग पर अग्रसर है। शारिब साहब अंतिम समय तक नियमित रूप से कॉलेज आते रहे और सभी कार्य अपनी निगरानी में ही करवाते थे।
उन्होंने कहा कि शारिब साहब ने अपनी पत्नी की याद में यह पुरस्कार शुरू किया था, जो उर्दू साहित्य की एक बड़ी और यादगार सेवा है। अपने संबोधन में मनीष शुक्ला ने वक़ार रिज़वी और शारिब रुदौलवी के संबंधों का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि ट्रस्ट में वक़ार रिज़वी के नाम से पत्रकारिता अवॉर्ड देने का निर्णय भी शारिब रुदौलवी ने अपने जीवनकाल में ही लिया था। यह वक़ार भाई के प्रति उनका शानदार और प्रेमपूर्ण सम्मान था।
मनीष शुक्ला ने उपस्थित लोगों के आग्रह पर अपनी एक ग़ज़ल भी सुनाई, जिसके दो शेर इस प्रकार थे—
हैं खुद मर्ज़ में गिरफ्तार हम पे हंसते हैं
तुम्हारे शहर के बीमार हम पे हंसते हैं
बस एक जुर्म किया और ज़लील-ओ-ख़्वार हुए
ज़माने भर के गुनहगार हम पे हंसते हैं
प्रो. सैयद वसीम अख़्तर ने अपने अत्यंत संक्षिप्त संबोधन में शारिब रुदौलवी और शमीम निख़त को याद करते हुए इन शेरों के साथ अपनी बात समाप्त की—
जो ख़याल थे न क़यास थे वही लोग मुझसे बिछड़ गए
जो मोहब्बतों की असास थे वही लोग मुझसे बिछड़ गए
मेरी धड़कनों के क़रीब थे, मेरी जान थे, मेरी चाह थे
वो जो रोज़-ओ-शब मेरे पास थे वही लोग मुझसे बिछड़ गए
दिल्ली से आए प्रो. मोहम्मद काज़िम ने भी शारिब रुदौलवी, शमीम निख़त और वक़ार रिज़वी को याद करते हुए कहा कि आज ये लोग हमारे बीच मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनकी उपस्थिति सभागार में महसूस होती है।
कानपुर से आए ख़ान अहमद फ़ारूक़ ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि शमीम निख़त उर्दू फ़िक्शन अवॉर्ड जिस स्तर और गरिमा के साथ स्थापित किया गया था, हम लोगों ने पूरी कोशिश की है कि उसका वही स्तर और सम्मान बरकरार रहे तथा ये समारोह इसी शान के साथ आयोजित होते रहें।
उन्होंने क़ुर्रतुलऐन हैदर के उपन्यास ‘आग का दरिया’ पर की गई इस आपत्ति का उल्लेख किया कि उसमें समय का दर्शन पश्चिम से लिया गया है। उन्होंने बताया कि जब यह आपत्ति उठाई गई तो क़ुर्रतुलऐन हैदर ने ‘आग का दरिया’ के अंग्रेज़ी अनुवाद (जिसे उन्होंने स्वयं किया था) से वह हिस्सा हटा दिया।
डॉ. सबीहा अनवर ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें बहुत से पुरस्कार मिले हैं, यहां तक कि यश भारती पुरस्कार भी मिला है, लेकिन शमीम निख़त के नाम से जुड़े उर्दू फ़िक्शन अवॉर्ड को प्राप्त करके उन्हें जिस खुशी और प्रसन्नता का एहसास हो रहा है, उसे वह शब्दों में बयान नहीं कर सकतीं। उन्होंने उन सभी लोगों का आभार व्यक्त किया, जिन्होंने उनके कथा साहित्य को स्वीकार करते हुए इस पुरस्कार के लिए उनके नाम का चयन किया।
क़ुर्रतुलऐन हैदर के संबंध में उठाए गए सवाल पर उन्होंने भी कहा कि ‘आग का दरिया’ के लिए उन्होंने न तो कहीं से साहित्यिक चोरी की है और न ही किसी अन्य स्रोत से सामग्री ली है। यह उनका अपना विचार, अपना अनुभव और मौलिक रचना है।
वक़ार रिज़वी पत्रकारिता अवॉर्ड प्राप्त करने वाले संजय शर्मा की पत्नी बबीता चतुर्वेदी ने भी आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें उर्दू नहीं आती, लेकिन यहां उर्दू के बड़े-बड़े साहित्यकारों और भाषा के जानकारों को सुनकर उनके मन में भी उर्दू सीखने की इच्छा पैदा हुई है।
विद्यार्थियों की कहानी लेखन प्रतियोगिता के परिणाम
रिसर्च स्कॉलर स्तर पर प्रथम पुरस्कार लखनऊ विश्वविद्यालय की साइमा माही और द्वितीय पुरस्कार ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय की अरसला इबरार को दिया गया।
एमए स्तर पर प्रथम स्थान लखनऊ विश्वविद्यालय की सदफ़ नूर और द्वितीय स्थान गुलनाज़ सिद्दीक़ी ने प्राप्त किया।
बीए स्तर पर प्रथम पुरस्कार मुमताज़ पीजी कॉलेज के रज़ा इबरार और मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी कैंपस, लखनऊ की बाद सबा को संयुक्त रूप से दिया गया। द्वितीय पुरस्कार भाषा विश्वविद्यालय के मोहम्मद अहमद और क्रिश्चियन कॉलेज की रमशा क़ुरैशी को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया। सांत्वना पुरस्कार बुशरा ख़ातून, ज़ैनब रुख़सार, आफ़रीन और समीरा मलिक को दिए गए।
यासमीन अंजुम के धन्यवाद ज्ञापन के साथ समारोह का समापन हुआ।
इस अवसर पर प्रो. क़मर जहां, प्रो. साबिरा हबीब, प्रो. हुमा ख़्वाजा, प्रो. सैयद शफ़ीक़ अशरफ़ी, प्रो. सौबान सईद, शाहिद हसनैन, असग़र हुसैन ज़ैदी, प्रो. अतीक़ फ़ारूक़ी, प्रो. जमाल नुसरत, प्रो. शबनम रिज़वी, डॉ. इशरत नाहिद, डॉ. नुज़हत, डॉ. वज़ाहत हुसैन रिज़वी, डॉ. सैरवत तकी, डॉ. मुजाहिदुल इस्लाम, डॉ. जांनिसार आलम, डॉ. नुसरत नाहिद, डॉ. परवीन शुजाअत, डॉ. बुशरा बानो, डॉ. सुल्तान शाकिर हाशमी, हकीम वसीम अहमद आज़मी, डॉ. मसीहुद्दीन ख़ान, इरफ़ान ज़ंगीपुरी, परवेज़ मलिकज़ादा, राजीव प्रकाश साहिर, एहतिशाम हुसैन, नग़मा इरफ़ान, नजमा नूरानी, अतिया रहमानी, मीरा त्रिपाठी, आयशा सिद्दीक़ी, शाहाना अब्बासी, ग़ुफ़रान नसीम, ओवैस संभली, एजाज़ परवेज़, शारिक हसनैन और अदील हसनैन सहित शहर के विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के शिक्षक, छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे और समारोह को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।



