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शहीद इमाम हुसैन की याद में नम हुईं आंखें एक मजलिस, एक पैग़ाम

आज़मगढ़ आज बाजबहादुर मोहल्ले में 8 मोहर्रम की सुबह कुछ अलग ही थी। मरहूम सैय्यद कमर हुसैन के आवास पर प्रातः लगभग 10 बजे आयोजित मजलिस में अकीदतमंदों का जमावड़ा लगा था। हर चेहरा ग़म और अकीदत से भरा हुआ था। माहौल में खामोशी थी, लेकिन दिलों में कर्बला की दास्तान गूंज रही थी।

मजलिस की शुरुआत जनाब ज़ैनुल अब्बास साहब के मर्सिये से हुई, जिन्होंने अपने कलाम के जरिए मौला की बारगाह में अकीदत के फूल पेश किए। इसके बाद आली जनाब मौलाना फहीम हुसैन साहब ने खिताब किया। जैसे-जैसे उन्होंने कर्बला का वाकया बयान करना शुरू किया, हर शख्स की निगाहें झुक गईं और आंखें नम होने लगीं।

मौलाना हुसैन साहब ने बताया कि कैसे हजरत अली ने पूरी दुनिया को सत्य, इंसाफ और सब्र का रास्ता दिखाया। एक ऐसी शख्सियत, जिन्होंने अपना पूरा जीवन अल्लाह की राह में गुजार दिया। यही वह विरासत थी, जिसे उनके बेटे इमाम हुसैन ने आगे बढ़ाया।

मौलाना ने जब कर्बला का मंजर पेश किया, तो ऐसा लगा जैसे वक्त ठहर गया हो। मुआविया की मृत्यु के बाद जब यज़ीद ने खुद को खलीफा घोषित किया और इमाम हुसैन से बैअत की मांग की, तब हुसैन ने साफ इंकार कर दिया। उनके लिए सत्ता से ज्यादा अहम था सच और इंसाफ।

इमाम हुसैन अपने परिवार और करीब 72 साथियों के साथ मदीना से कूफ़ा की ओर रवाना हुए। रास्ते में कर्बला के तपते रेगिस्तान में उनका काफिला रोक लिया गया। कई दिनों तक उन्हें पानी और खाने से महरूम रखा गया, लेकिन उनके हौसले में कोई कमी नहीं आई।

10 मुहर्रम, यानी आशूरा के दिन, जब जंग शुरू हुई, तो एक तरफ हक था और दूसरी तरफ ताकत का घमंड। इमाम हुसैन और उनके साथियों ने बहादुरी की ऐसी मिसाल पेश की, जो इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गई। एक-एक कर सभी ने कुर्बानी दी, लेकिन ज़ुल्म के आगे सिर नहीं झुकाया।

हजरत अब्बास की वफादारी और हजरत कासिम की जवानी की कुर्बानी को जब याद किया गया, तो मजलिस में सिसकियों की आवाजें गूंज उठीं। हर दिल यही कह रहा था कि यह सिर्फ एक जंग नहीं थी, बल्कि इंसानियत की सबसे बड़ी मिसाल थी।

मजलिस के आखिर में मौलाना ने कहा कि मोहर्रम सिर्फ ग़म का महीना नहीं, बल्कि एक पैग़ाम है—सच के साथ खड़े होने का और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का। आज भी इमाम हुसैन की यह सीख दुनिया भर के लोगों, खासकर युवाओं को हिम्मत देती है।

“शहादत सआदत है और जालिम के मुकाबिल खामोश रहना जिल्लत” — यह सिर्फ एक जुमला नहीं, बल्कि एक रास्ता है, जो हर दौर में इंसान को सच्चाई की ओर ले जाता है।

शिया कम्युनिटी के चेयरमैन जनाब अज़ादार हुसैन ने बताया कि हर साल मोहर्रम आता है और हमें याद दिलाता है कि कर्बला सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि एक सोच है—जो हमें सिखाती है कि हालात चाहे जैसे भी हों, सच का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। अंत में उन्होंने आए हुए सभी लोगों का शुक्रिया अदा किया।

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