नई दिल्ली। देश के प्रमुख औद्योगिक घरानों में शामिल टाटा ग्रुप में बोर्ड के फैसलों को लेकर विवाद गहराता नजर आ रहा है। टाटा समूह से जुड़े मौजूदा घटनाक्रम के बीच वरिष्ठ अधिवक्ता डारियस खंबाटा ने बोर्ड के निर्णयों और उनकी कार्यप्रणाली पर अपनी नाराजगी जाहिर की है। उनके सवालों ने कॉरपोरेट जगत में एक बार फिर बोर्ड की जवाबदेही, पारदर्शिता और अधिकारों को लेकर बहस छेड़ दी है।
डारियस खंबाटा की आपत्तियों के बाद यह मामला चर्चा का विषय बन गया है। माना जा रहा है कि टाटा ग्रुप के भीतर लिए जा रहे फैसलों और उन्हें लागू करने की प्रक्रिया पर उठे सवालों का असर समूह की कॉरपोरेट व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
वहीं, इस पूरे मामले पर वित्त मंत्री की टिप्पणी ने विवाद को और अहम बना दिया है। वित्त मंत्री ने इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाया है और बोर्ड के फैसलों को लेकर सरकार की ओर से क्या संदेश दिया गया है, इस पर उद्योग जगत की नजरें टिकी हुई हैं।
टाटा ग्रुप की पहचान लंबे समय से अपनी मजबूत संस्थागत व्यवस्था और कारोबारी साख के लिए रही है। ऐसे में बोर्ड के फैसलों पर उठते सवाल न केवल समूह के लिए बल्कि देश के कॉरपोरेट प्रशासन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि टाटा ग्रुप इस विवाद पर क्या कदम उठाता है और बोर्ड के फैसलों को लेकर उठाई गई आपत्तियों का आगे क्या नतीजा निकलता है।


