लखनऊ के हुसैनाबाद इलाके की रहने वाली नाज़रा बीबी कभी स्कूल नहीं गई थीं। कम उम्र में निकाह हुआ, फिर चार बच्चों की परवरिश में ज़िंदगी बीतती चली गई। लेकिन दिल के किसी कोने में हमेशा एक कसक रही — “काश मैं भी पढ़ पाती।”
पिछले साल, जब मोहल्ले के मदरसे में एक टीचर की ज़रूरत थी, तो नाज़रा बीबी ने मज़ाक में पूछा — “क्या लड़कियाँ भी पढ़ा सकती हैं?” मौलवी साहब ने मुस्कुराकर कहा, “अगर पढ़ी-लिखी हों तो क्यों नहीं?”
बस, उसी दिन से नाज़रा बीबी ने कुछ नया शुरू किया।
वो दिन में घर का काम करतीं, और रात में अपने बेटे से A-B-C-D सीखतीं। छह महीने में उन्होंने अंग्रेज़ी की बेसिक बुक्स पढ़ना शुरू कर दिया। और आज वो उसी मदरसे में 8 से 12 साल के बच्चों को इंग्लिश पढ़ा रही हैं।
लड़कियों की क्लास में सबसे ज़्यादा भीड़ उन्हीं की होती है।
उनकी क्लास में स्लेट नहीं, वाइटबोर्ड है। बच्चे अब ‘this is a pen’ से आगे ‘my name is Ahmed and I want to become a doctor’ तक बोलने लगे हैं।
नाज़रा बीबी कहती हैं:
“मुझे मदरसा कभी अपना नहीं लगता था, लगता था ये सिर्फ पुरुषों की जगह है। लेकिन आज यही जगह मुझे नया मक़सद दे रही है।”
गांव की औरतें अब कहती हैं – “अगर नाज़रा पढ़ा सकती है, तो हम भी पढ़ सकते हैं।”
अब मोहल्ले की और 3 महिलाएं भी उनके साथ पढ़ने लगी हैं।





