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अब कैराना और नूरपुर बना भाजपा के लिए चुनौती

अब कैराना और नूरपुर बना भाजपा के लिए चुनौती
सय्यद काजि़म रज़ा शकील 
लखनऊ।
एक के बाद एक राज्यों में अपनी जीत का शानदार गाथा लिखने वाली भारतीय जनता पार्टी को कर्नाटक में करारी राजनैतिक और रणनीतिक शिकस्त मिली है। कर्नाटक में भाजपा को शिकस्त देने के बाद कांग्रेस और सहयोगी दलों के हौसले बुलंद हैं। कांग्रेस व सहयोगी दलों के बुलंद हौसले का सीधा असर प्रदेश के कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा उपचुनाव में पड़ेगा,  जिससे बचनागोरखपुर और फूलपुर लोकसभा में अप्रत्याशित हार का दंश झेल रही प्रदेश भाजपा सरकार के लिए चुनौती होगा। कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा के लिए 28 मई को उपचुनाव होना है और यह सीटें जीत कर पार्टी नेतृत्व का विश्वास बनाए रखना सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित प्रदेश भाजपा के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। सूत्रों के अनुसार भाजपा उपचुनाव वाले क्षेत्रों में तो नहीं लेकिन उसी के किसी पास के ज़िले में परधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली करा सकती है ताकि इज़्ज़त बचाने के प्रयास में कोई कमी न हो।
कैराना लोकसभा से भाजपा के हुकुम सिंह और नूरपुर विधानसभा से लोकेंद्र सिंह जीते थे, लेकिन दोनों ही नेताओं के निधन से कैराना और नूरपुर में उपचुनाव हो रहे हैं। इससे पहले गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के सीट छोडऩे की वजह से उपचुनाव हुआ था। उपचुनाव मेंं बहुजन समाज पार्टी का साथ मिलने के बाद समाजवादी पार्टी ने अप्रत्याशित रूप से न सिर्फ फूलपुर बल्कि दो दशक के समय से अधिक भाजपा की परम्परागत सीट रही गोरखपुर में भी साइकिल चला कर राजनैतिक विश्लेषकों की आशंकाओं को निराधार साबित कर दिया। गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी भी उतारा था, जबकि कैराना और नूरपुर में कांग्रेस ने संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार को समर्थन की घोषणा की है। इससे पहले समाजवादी पार्टी और राष्टï्रीय लोकदल ने गठबंधन करते हुए कैराना से रालोद और नूरपुर से सपा ने चुनाव लडऩे का ऐलान किया। कैराना में रालोद के टिकट पर सपा की तबस्सुम हसन और नूरपुर से सपा प्रत्याशी नईमुल हसन मैदान में हैं। जबकि भाजपा ने सहानुभूति वोट के चलते कैराना से दिवंगत सांसद हुकुम सिंह की पुत्री मृगांका सिंह और नूरपुर से दिवंगत विधायक लोकेंद्र सिंह की पत्नी अवनि सिंह को उम्मीदवार बनाया है।
कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा उपचुनाव सिर्फ उत्तरप्रदेश ही नहीं बल्कि देश की राजनीति के लिए नया संदेश लेकर जायेगा। जहाँ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत कई मंत्रियों ने कर्नाटक में डेरा डालकर यह साबित करने का प्रयास किया था कि यहां के भाजपा नेता राष्टï्रीय स्तर पर राजनीति में उलटफेर की महारत रखते हैं। लेकिन खुद अपनी और उपमुख्यमंत्री के सीट बचा पाने में असफल रहे प्रदेश के मुखिया के लिए कैराना एक कठिन परीक्षा है। इसके परिणाम आने वाले 2019 के लोकसभा चुनाव की ही नहीं बल्कि प्रदेश सरकार की पटकथा लिखने को तैयार है।
कर्नाटक के नाटकीय घटनाक्रम से कांग्रेस व सहयोगी दलों के कार्यकर्ताओं में काफी उत्साह है कर्नाटक के चलते भाजपा के शीर्ष नेताओं ने कैराना में कोई खास ध्यान नहीं दिया वहीं गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में बुरी तरह से नकारी गयी कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी न उतारकर सपा-बसपा के गठबंधन में अपनी संभावनाएं तलाशने इशारा दिया है। जबकि दोनों दलों ने अभी तक कोई ऐसा इशारा नहीं किया जिससे यह कहा जाये की कांग्रेस को कोई तवज्जो दी जा रही है। लेकिन जिस तरह कर्नाटक में कॉंग्रेस ने लड़ाई लड़ी उससे लगता है कि मुलायम सिंह के बयान के बाद भी कांग्रेस सपा-बसपा गठबंधन के बीच सम्मानजनक सीटें हासिल कर सकती है। लेकिन यह सब भाजपा की कैराना में संयुक्त विपक्ष की हार-जीत पर निर्भर करेगा। अब देखना यह है कि भाजपा किस रणनीति का सहारा लेकर अपनी नैया पार लगाने की तैयारी करती है क्योंकि बीते कई सालों से साम्प्रदायिक तनाव का दंश झेल रहा पश्चिमी उत्तर प्रदेश तनाव की राजनीति से उकता गया है।
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