राज्यसभा चुनाव: दलित वोटों में सेंध लगाने की भाजपा रणनीति को झटका
परिवारवाद का ठप्पा हटाने के लिए खुद की जगह पार्टी के पूर्व विधायक को बनाया प्रत्याशी
लोकसभा उप चुनाव में सपा को समर्थन देकर विपक्षी एकजुटता को किया मजबूत
लखनऊ। राज्यसभा और लोकसभा उपचुनाव में दलितों को भाजपा के पाले में जाने से रोकने के लिए मायावती ने एक और दांव चला है। मायावती ने राज्यसभा चुनाव में खुद या अपने भाई आनंद कुमार को प्रत्याशी न बनाकर पार्टी के एक पूर्व विधायक भीमराव अंबेडकर को उम्मीदवार बनाया है। बसपा प्रमुख ने यह फैसला लेकर विरोधियों का मुंह बंद कर दिया है जो यह उन पर परिवारवाद का आरोप लगाते नहीं थकते थे। साथ ही लोकसभा की गोरखपुर और फूलपुर सीटों पर होने वाले उपचुनाव में सपा को समर्थ देकर भाजपा को घेरने का दांव भी चल दिया है।

परिवारवाद का ठप्पा हटाने के साथ ही राजनीतिक फायदा लेने के लिए मायावती ने नया राजनीतिक दांव चलकर सभी को चौंका दिया है। यूपी में राज्यसभा की सीट को लेकर पिछले कुछ दिनों से सपा-बसपा के गठबंधन की चर्चा थी। मायावती ने राज्यसभा उम्मीदवार के नाम का ऐलान कर सबको चौंका दिया। चर्चा इस बात की थी कि मायावती अपने भाई आनंद कुमार को राज्यसभा भेजना चाहती हैं लेकिन उन्होंने इसके बजाय कभी कांशीराम के सहयोगी रहे और पार्टी के पूर्व विधायक भीमराव अंबेडकर को राज्यसभा भेजने का ऐलान किया। इस फैसले से मायावती ने दो समीकरण साधने की कोशिश की है। अपने इस निर्णय से एक ओर वे परिवारवाद के आरोपों से बच गईं तो दूसरी ओर दलित वोटों को साधने की भाजपा की कोशिशों को भी इससे झटका लगेगा। भीमराव उत्तर प्रदेश के इटावा के रहने वाले हैं और पूर्व में विधायक रह चुके हैं। मायावती ने मंगलवर को राज्यसभा चुनाव की तैयारी के लिए देर शाम बीएसपी मुख्यालय में विधायकों और पार्टी के प्रमुख नेताओं के साथ बैठक की और सबको चौंकाते हुए भीमराव अंबेडकर के नाम की घोषणा की। इस फैसले से मायावती ने अपने मूल वोट बैंक को साधने की कोशिश की है। वहीं भाजपा के दलितों को अपने पाले में करने की कोशिशों को झटका दिया है। बसपा के राज्यसभा प्रत्याशी भीमराव अंबेडकर पार्टी प्रमुख मायावती के काफी करीबी माने जाते हैं। मौजूदा समय में वो कानपुर मंडल जोनल कोऑर्डिनेटर हैं। भीमराव बीएसपी संस्थापक कांशीराम के समय से ही सक्रिय भूमिका में रहे है। पार्टी के मिशनरी कार्यकर्ताओं में उनका नाम गिना जात है। बीएसपी संस्थापक कांशीराम ने 1991 में जब सपा के सहयोग से इटावा लोकसभा से संसदीय का चुनाव जीता था, उस समय से भीमराव पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता रहे हैं। वे पेशे से वकील हैं और उन्होंने अंबेडकर के आर्थिक विचार और वर्तमान में उनकी उपयोगिता सब्जेक्ट पर कानपुर विश्वविद्यालय में शोधग्रंथ प्रस्तुत किया था, पर दुर्भाग्य से उन्हें डिग्री नहीं मिल सकी। बसपा प्रमुख के इस दांव से भाजपा की दलित वोटों में सेंध लगाने की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। हालांकि भाजपा नेताओं को कहना है कि इससे चुनाव पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। भाजपा की जनहितैषी नीतियों के कारण दलित समुदाय के लोग पार्टी से लगातार जुड़ रहे हैं।
पहली बार 2007 में विधायक बने थे भीमराव
राज्यसभा के लिए मायावती की पहली पंसद बने भीमराव अंबेडकर विधायक भी रह चुके हैं। 2007 में मायावती ने उन्हें इटावा के लखना विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया था, जिस पर वे खरे उतरे और चुनाव जीतकर पहली बार विधायक बने। हालांकि पांच साल के बाद दोबारा से 2012 में विधानसभा चुनाव हुए तो वे जीत नहीं पाए। इसके बावजूद वे पार्टी में सक्रिय रहे और दलित मूवमेंट के लिए काम करते रहे।
राज्यसभा का गणित
यूपी में 403 विधानसभा सीटें हैं, यहां राज्यसभा की 10 सीटों के लिए चुनाव होना है। राज्यसभा चुनाव का फॉर्मूला है, खाली सीटों में एक जोड़कर विधानसभा की सदस्य संख्या से भाग दें। निष्कर्ष में एक जोडऩे पर जो संख्या आती है उतने ही वोट एक सदस्य को राज्यसभा चुनाव जीतने के जरूरी होता है। उदाहरण के लिए 10 सीटों में 1 को जोड़े तो 11 हुए। अब 403 को 11 से भाग देते हैं तो आता है 36.63 इसमें 1 जोड़ा जाए तो आते हैं 37.63 यानी यूपी राज्यसभा चुनाव जीतने के लिए एक सदस्य को औसतन 38 विधायकों का समर्थन चाहिए।
बीजेपी के 8,सपा के एक और एक विपक्ष का संयुक्त प्रत्याशी
यूपी विधानसभा में सदस्यों की संख्या 403 है, जिसमें 402 विधायक 10 राज्यसभा सीटों के लिए वोट करेंगे। इस आंकड़े के मुताबिक बीजेपी गठबंधन के खाते में 8, सपा को एक सीट क्योंकि सपा के पास 47 विधायक हैं। बची एक सीट के लिए सपा के 10 अतरिक्त वोट, बीएसपी के 19, कांग्रेस के 7 और 3 अन्य मिलाकर राज्यसभा में एक प्रत्याशी को भेज सकते हैं।





