अशरा ए अरबाईन की पहली मजलिस का आयोजन
उझारी। कस्बे में स्थित आजाखाना ए बाबुल हवाईज में अशरा ए (अरबाइन) चेहल्लुम ए शहीदे कर्बला की याद में शनिवार को पहली मजलिस का आयोजन किया गया। जिसमें मर्सियाख्नी जीशान हैदर और उनके हमनवाओं ने की तथा पैशखानी सैयद बिलाल बाक़री ने की। मजलिस को खाता जिला बरेली से तशरीफ़ लाए मौलाना अरशद अब्बास ज़ैदी ने खिताब फरमाया। उन्होंने कहा कि दुनिया में कोई ऐसा फर्श नहीं मिलता सिवाय मजलिस ए इमाम ए हुसैन के जहां पर पंजतन पाक अलैहिस्सलाम तशरीफ लाते हैं। उन्होंने कहा कि इस मजलिस ए हुसैन की बहुत ही अजीम मंजिलत है। इधर मजलिस का फर्श बिछता है उधर अर्श से पंजेतन पाक और फरिश्ते इस मजलिस को सुनने के लिए तशरीफ ले आते हैं।
इमामे हुसैन को उनके साथियों का पुरसा पेश करते हैं। इमामे हुसैन ने 10 मोहर्रम को (इराक) कर्बला के मैदान में जो कुर्बानियां पेश की उसने इस्लाम को ता कयामत तक के लिए गुलजार कर दिया। इमामे ए हुसैन ने अपने नाना के दीन को बचाने के लिए अपने 71 साथियों के साथ कर्बला के मैदान में जामे शहादत नौश फरमाया। मगर यज़ीद के सामने सर को न झुकाया और उसकी बैयत को कुबूल नहीं किया। जबकि मदीने के अंदर बड़े-बड़े हाफिज ए कुरान मुसलमानों ने यजीद की बैयत को कबूल कर लिया था और सब अपने घरों में आराम से बैठ गए थे। लेकिन इमामे हुसैन ने कहा कि यजीद मुझ जैसा कभी भी तुझ जैसे की बैयत नहीं कर सकता।
कयामत तक के लिए यह उसूल बना दिया कि जो भी हुसैन जैसा होगा यानी सच्चा रसूल का आशिक होगा वो कभी भी अपने वक्त की यजीद की बैयत नहीं कर सकता। मौलाना ने कर्बला के मसाईब बयान किए जिसे सुनकर आज़ादर दहाड़े मार मार कर रोने लगे। आखिर में मुल्क और कौम की तरक्की के लिए दुआ कराई गई। इस मौके पर मुख्य रूप से शिया जामा मस्जिद के इमाम ए जुमा मौलाना सरकार मेहंदी साहब, मतव्वाली नूरुल हसन, हसन मेहंदी, शफीउल हसन, मेहंदी हसन, मोहम्मद असगर, एडवोकेट आदिल जैदी, अली चांद, कमर मेहंदी, सलमान हसन, सफदर अब्बास, नवाब हैदर, जफर अब्बास आदि भारी संख्या में अजादार मौजूद रहे।





