सातवीं तारीख को बिठाया जाएगा ताजिया
रामनगर/चन्दौली। गंगा जमुनी तहजीब की जीती जागती मिसाल बन चुके काशिराज की मन्नत का दुलदुल का जुलूस पांचवी तारीख पर रविवार की रात निकाला गया। सुन्नी समाज द्वारा निकाले जाने वाले इस दुलदुल में हिन्दू समाज के लोग भी भागीदारी करते हैं। दुलदुल की सजावट से लेकर इसकी रवानगी तक में हिन्दू और मुस्लिम सभी साथ साथ भागीदारी करते हैं। सुन्नी सम्प्रदाय द्वारा आयोजित किये जाने वाले इस आयोजन का यह दुलदुल गोलाघाट इमामबाड़े में सजाया गया। घोड़े को पहले सफेद चादर ओढ़ा कर मखमली चादर पहनाया गया। उसके बाद फूलों की चादर पहनाई गई।
छतर नीबूं तीर तलवार आदि लगाए गए। सेहरा भी पहनाया गया। गोलाघाट से रात्रि आठ बजे दुलदुल का जुलूस निकला। सबसे आगे आगे अलम लिए लोग चल रहे थे। ताशा बजता हुआ चल रहा था। जुलस में शामिल लोग नोहा ख्वानी करते चल रहे थे। जुलूस अपने कदीमी रास्तों से होते हुए निकला। रास्ते में लोगों ने दुलदुल को दूध पिलाया,नीबूं चढ़ाया और मन्नतें मांगी। जिन लोगों की मन्नतें पूरी हो गई थी उन्होंने चांदी के नीबूं चढ़ाए। पंचवटी कर्बला पहुँच कर दुलदुल को ठंडा किया गया। ऐसा कहा जाता है कि काशिराज ईश्वरी नारायण सिंह की तबियत ज्यादा खराब हो गई थी।
तब राज नर्तकी जिओ बीबी ने मन्नत मांगी थी कि महाराज की तबियत ठीक होने पर दुलदुल निकाला जाएगा और ताजिया बिठाया जाएगा। तभी से पांचवी मुहर्रम को दुलदुल निकलने और सातवीं तारीख को ताजिया बिठाने की परंपरा शुरू हुई। मुहर्रम की सातवीं तारीख को काशिराज की मन्नत का ताजिया गोलाघाट में बिठाया जाता है। राजपरिवार द्वारा आज भी इन आयोजनों के लिए आर्थिक सहायता की जाती है।
इमाम चौकों पर बिठाए जाने वाले अन्य ताजिये दफन किये जाते हैं लेकिन काशिराज की मन्नत का ताजिया गंगा में बहा दिया जाता है। पहले रामनगर किले में हर शाम बजने वाली नौबत मुहर्रम के दौरान नही बजाई जाती थी। तीजा के दिन फिर से नौबत बजाने का क्रम शुरू हो जाता था। लेकिन समय के साथ साथ यह परंपरा बन्द हो गई। दुलदुल आयोजन में बाबू खां, हीरा सेठ, हमीदुल्ला, मुस्तफा,आकिल मिर्ज़ा, कामिल मिर्ज़ा,अब्दुल्ला,पप्पू, नूरुलशेख,साजिद खां ताऊ, मनोज मौर्या, शुभम रावत आदि ने सक्रिय योगदान दिया।





