लखनऊ मजलिस-ए-अज़ा को संबोधित करते हुए मौलाना सलमान अली नजफ़ी ने कहा कि अज़ादारी-ए-इमाम हुसैन (अ.स.) का बुनियादी मक़सद इमाम हुसैन (अ.स.) के महान मिशन को समझना, उसकी शिक्षाओं को अपनी ज़िंदगी में लागू करना और पैग़ाम-ए-कर्बला को आने वाली नस्लों तक पहुँचाना है।
उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन (अ.स.) ने उम्मत-ए-मुहम्मदी (स.) की इस्लाह, अम्र बिल-मअरूफ़ व नहीं अनिल-मुनकर तथा दीन-ए-इस्लाम की बक़ा के लिए अपने अहलेबैत (अ.स.) और वफ़ादार साथियों के साथ बेमिसाल क़ुर्बानियाँ पेश कीं। अहलेबैत (अ.स.) के मसाइब पर ग़म मनाना, आँसू बहाना और मातम करना मोहब्बत, अकीदत और वफ़ादारी का इज़हार है, लेकिन अज़ादारी का तक़ाज़ा यह भी है कि इंसान इमाम हुसैन (अ.स.) के अफ़कार और तालीमात को समझे तथा उन्हें अपनी व्यक्तिगत और सामाजिक ज़िंदगी का हिस्सा बनाए।
मौलाना सलमान अली नजफ़ी ने आगे कहा कि वाक़िआ-ए-कर्बला हर दौर के इंसान को हक़ और बातिल में फ़र्क़ करने, ज़ुल्म के मुक़ाबले में डटे रहने, सब्र, तक़वा, ईसार और अद्ल व इंसाफ़ क़ायम करने का पैग़ाम देता है। उन्होंने उपस्थित लोगों से अपील की कि वे मजलिस-ए-अज़ा से हासिल होने वाले संदेश को अपनी अमली ज़िंदगी में उतारें और सीरत-ए-इमाम हुसैन (अ.स.) को अपने किरदार और अमल का नमूना बनाएं। अंत में शोहदाए कर्बला को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया गया और उपस्थित लोगों ने इमाम हुसैन (अ.स.) के मिशन-ए-हक़ पर क़ायम रहने का संकल्प व्यक्त किया।





