कांग्रेस ने केरल में मुख्यमंत्री चयन में 10 दिन लगाए, जबकि भाजपा ने बंगाल में 48 घंटे में फैसला लिया, जो दोनों पार्टियों की चुनाव के बाद की रणनीति में बड़ा अंतर दर्शाता है।
कांग्रेस ने आखिरकार बुधवार को केरल में मुख्यमंत्री के नाम पर चल रहा सस्पेंस खत्म कर दिया। यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) की ऐतिहासिक जीत के 10 दिन बाद वीडी सतीशन को मुख्यमंत्री घोषित किया गया।
कांग्रेस ने 63 सीटें जीतीं जबकि यूडीएफ गठबंधन को 140 सदस्यीय विधानसभा में कुल 102 सीटें मिलीं। इसके बावजूद मुख्यमंत्री चयन में देरी ने पार्टी की अंदरूनी खींचतान को फिर सामने ला दिया।
इसके उलट पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने चुनाव जीतने के करीब 48 घंटे के भीतर ही सुवेंदु अधिकारी को मुख्यमंत्री घोषित कर दिया था। बीजेपी ने पहली बार राज्य में 207 सीटें जीतकर सरकार बनाई और नतीजों के तुरंत बाद नेतृत्व पर फैसला ले लिया।
असम में भी बीजेपी ने भारी बहुमत मिलने के बाद बिना ज्यादा विवाद के हिमंत बिस्वा सरमा को मुख्यमंत्री बनाए रखा। पार्टी में यह लगभग तय माना जा रहा था क्योंकि उन्होंने लगातार दूसरी बार बीजेपी को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी।
बीजेपी और कांग्रेस के तरीके में बड़ा फर्क
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार बीजेपी और कांग्रेस की सबसे बड़ी अलग पहचान चुनाव जीतने के बाद फैसले लेने के तरीके में दिखाई देती है। बीजेपी जीत को सत्ता संभालने की शुरुआत मानती है, जबकि कांग्रेस में जीत के बाद भी लंबे समय तक बातचीत और गुटबाजी चलती रहती है।
2014 के बाद बीजेपी ने कई राज्यों में ऐसा मॉडल अपनाया जिसमें पार्टी अक्सर बड़े और चर्चित चेहरों की बजाय संगठन से जुड़े नेताओं को मुख्यमंत्री बनाती रही। इसका मकसद क्षेत्रीय नेताओं को जरूरत से ज्यादा ताकतवर होने से रोकना और यह संदेश देना था कि जीत पार्टी और केंद्रीय नेतृत्व की है।
हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर, गुजरात में भूपेंद्र पटेल, राजस्थान में भजनलाल शर्मा, मध्य प्रदेश में मोहन यादव और छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय इसके उदाहरण माने जाते हैं। ये ऐसे नेता थे जो राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा चर्चित नहीं थे लेकिन संगठन के भरोसेमंद चेहरे थे।
कांग्रेस में अक्सर लंबा चलता है शक्ति संघर्ष
इसके विपरीत कांग्रेस में मुख्यमंत्री चयन को लेकर लंबे विवाद कई बार सामने आए हैं। कर्नाटक में 2023 की जीत के बाद सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच कई दिनों तक खींचतान चली थी। आखिर में सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बने जबकि शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री बनाया गया।
2018 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जीत के बाद भी कांग्रेस नेतृत्व को कई दिनों तक फैसले लेने में समय लगा था। राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच विवाद लंबे समय तक चला और सरकार तक संकट में आ गई थी।
केरल में भी इस बार मुख्यमंत्री पद की दौड़ में केसी वेणुगोपाल, वीडी सतीशन और रमेश चेन्निथला के नाम सामने थे। राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और दूसरे वरिष्ठ नेताओं के साथ लगातार बैठकों के बाद आखिरकार सतीशन के नाम पर सहमति बनी।
बंगाल और असम में बीजेपी ने क्यों बदला तरीका?
हालांकि बंगाल और असम में बीजेपी ने अपेक्षाकृत बड़े और प्रभावशाली नेताओं को मुख्यमंत्री बनाया। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह बीजेपी की रणनीति के खिलाफ नहीं था, बल्कि परिस्थितियों के हिसाब से लिया गया फैसला था।
हिमंत बिस्वा सरमा ने 2015 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी जॉइन की थी और पूर्वोत्तर में पार्टी का विस्तार करने में बड़ी भूमिका निभाई। वहीं सुवेंदु अधिकारी बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के मजबूत नेता रहे और उन्होंने ममता बनर्जी को नंदीग्राम और बाद में भवानीपुर जैसी सीटों पर हराकर बीजेपी को बड़ी बढ़त दिलाई।
सुवेंदु अधिकारी की खासियत यह भी मानी जा रही है कि वह तृणमूल कांग्रेस के संगठन और जमीनी नेटवर्क को करीब से जानते हैं। बीजेपी अब बंगाल में अपनी जीत को स्थायी ताकत में बदलना चाहती है और इसके लिए अधिकारी को अहम चेहरा माना जा रहा है।
कांग्रेस और बीजेपी की राजनीति में मूल अंतर
पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह दिखाया कि बीजेपी और कांग्रेस सत्ता को संभालने के तरीके में कितना अलग सोचती हैं। बीजेपी में फैसले जल्दी और केंद्रीकृत तरीके से लिए जाते हैं ताकि नेतृत्व मजबूत दिखाई दे।
दूसरी तरफ कांग्रेस में चुनाव जीतने के बाद भी गुटों के बीच संतुलन बनाने और नेताओं को साधने की कोशिश लंबे समय तक चलती रहती है। यही वजह है कि कई बार साफ जनादेश मिलने के बाद भी पार्टी में अनिश्चितता बनी रहती है।





