भारत में 11 हवाई अड्डों के निजीकरण के लिए सरकार बोली नियमों में बदलाव पर विचार कर रही है, ताकि किसी एक समूह का एकाधिकार रोका जा सके। नए नियमों में बोली सीमा तय की जा सकती है, जिससे अदाणी समूह जैसे बड़े खिलाड़ियों को झटका लग सकता है और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
भारत में 11 एयरपोर्ट को निजी (Airport Privatisation) हाथों में सौंपने की तैयारी है लेकिन सरकार इस प्रस्तावित निजीकरण को लेकर नए नियमों पर विचार कर रही है। दरअसल, सरकार किसी एक इकाई या समूह द्वारा लगाई जाने वाली बोली पर लिमिट तय करने के बारे में सोच रही है। यह कदम नागरिक उड्डयन क्षेत्र में बाजार के केंद्रीकरण और एकाधिकार के खतरे को लेकर बढ़ती चिंताओं के मद्देनजर उठाया जा रहा है। ये चिंताएं पिछले साल इंडिगो संकट के बाद पैदा हुई थीं, जिसका असर पूरे उद्योग पर पड़ा। ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रक्रिया में शामिल सरकारी अधिकारियों ने कहा कि प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को किसी एक उद्यम के हाथों में केंद्रित होने से रोकने के लिए बोली नियमों को संरचित करने के तरीकों पर चर्चा शुरू हो गई है।
अगर सरकार ऐसा नियम लाती है तो अदाणी समूह (Adani Group) को बड़ा झटका लग सकता है। दरअसल, 2018 में हुए 6 हवाई अड्डों के निजीकरण के दौरान ऐसी कोई सीमा नहीं थी। उस समय अदाणी ग्रुप (Adani Enterprises) ने सभी 6 हवाई अड्डों की बोली जीत ली थी। अब 11 एयरपोर्ट्स की नई नीलामी के लिए भी अदाणी ग्रुप ने आक्रामक रूप से बोली लगाने के संकेत दिए हैं। इसी कारण नीति निर्माताओं के लिए एकाधिकार रोकने वाला यह नियम लाना काफी अहम हो गया है।
क्या है बिडिंग पर लिमिट?
भारत सरकार जल्द ही 11 हवाई अड्डों का निजीकरण करने जा रही है और इनकी नीलामी को लेकर बिडिंग लिमिट पर विचार विचार कर रही है, जिसके तहत किसी एक कंपनी या समूह द्वारा जीते जा सकने वाले हवाई अड्डों की एक अधिकतम सीमा (Bid Cap) तय की जा सके। दरअसल, सरकार यह कदम इसलिए उठा रही है ताकि एविएशन सेक्टर में किसी एक कंपनी का एकाधिकार न बन रहे और हेल्दी कॉम्पिटिशन बना रहे। पिछले साल एयरलाइन कंपनी इंडिगो से जुड़े संकट के कारण पूरा हवाई यातायात चरमरा गया था। सरकार ने इससे सबक लिया है कि किसी भी महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे का नियंत्रण सिर्फ एक प्लेयर के हाथ में जाना पूरे सिस्टम के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
ब्लॉक सिस्टम: खास प्रस्ताव को लेकर चल रही चर्चा मुताबिक, किसी एक कंपनी को अधिकतम 2 ब्लॉक (यानी कुल 4 एयरपोर्ट) ही दिए जा सकते हैं। यदि वही कंपनी तीसरे ब्लॉक के लिए सबसे बड़ी बोली लगाती है, तो दूसरे नंबर की बोली (Second-highest bidder) लगाने वाली कंपनी को मैचिंग प्राइस (उसी कीमत पर) का विकल्प दिया जाएगा।
छोटे और बड़े एयरपोर्ट की बंडलिंग: इस बार सरकार 7 छोटे और कम मुनाफे वाले हवाई अड्डों को 6 बड़े हवाई अड्डों के साथ जोड़कर नीलाम करेगी (जैसे- वाराणसी के साथ कुशीनगर और गया को जोड़ा जाएगा), ताकि छोटे हवाई अड्डों पर भी निजी निवेश आ सके और उनका विकास हो।
तीसरे फेज में किन एयरपोर्ट्स का निजीकरण?
तीसरे फेज में सरकार जिन एयरपोर्ट का निजीकरण करने जा रही है उनमें अमृतसर, कांगरा, वाराणसी, कुशीनगर, गया, भुवनेश्वर, हुबली, रायपुर, औरंगाबाद, त्रिची और तिरुपति शामिल हैं।
किन कंपनियों की कितनी हिस्सेदारी?
भारत में GMR समूह का एयरपोर्ट पर सबसे ज्यादा 27.2 फीसदी कंट्रोल है, और इसके पास दिल्ली, हैदराबाद, गोवा और नागपुर जैसे एयरपोर्ट हैं। इसके बाद अदाणी ग्रुप के पास 23 फीसदी नियंत्रण है और इस समूह के पास मुंबई, नवी मुंबई, अहमदाबाद, लखनऊ, जयपुर, गुवाहाटी और त्रिवेंद्रम एयरपोर्ट का कंट्रोल है। वहीं, Fairfax का 11 फीसदी कंट्रोल है और इसके हिस्से में सिर्फ बेंगलुरु एयरपोर्ट है।





