Saturday, April 11, 2026
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‘शापूरजी पालोनजी ग्रुप को मिलेगा फायदा’…TATA Sons IPO के फेवर में आए वेणु श्रीनिवासन; ट्रस्ट के भीतर फूट बढ़ने की आशंका

वेणु श्रीनिवासन ने टाटा संस के आईपीओ का समर्थन किया है, जो टाटा ट्रस्ट्स के पिछले रुख के विपरीत है। उन्होंने कहा कि आरबीआई द्वारा टाटा संस को ‘अपर लेयर एनबीएफसी’ वर्गीकृत करने पर लिस्टिंग आवश्यक हो जाएगी।

वेणु श्रीनिवासन (Venu Srinivasan) ने टाटा संस की पब्लिक लिस्टिंग (TATA Sons IPO) के आइडिया का सपोर्ट किया है। यह पहली बार है जब टाटा ट्रस्ट्स के किसी ट्रस्टी ने पब्लिकली ऐसे कदम का सपोर्ट किया है। उन्होंने कहा कि अगर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ग्रुप की होल्डिंग कंपनी को ‘अपर लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनी’ (NBFC) के तौर पर क्लासिफाई करता है, तो यह कदम उठाना जरूरी हो जाएगा। अनुमान लगाया जा रहा है कि यह श्रीनिवासन का ये बयान टॉप लेवल के लोगों के बीच विचारों में बढ़ रहे मतभेद को दर्शाता है, क्योंकि अब तक टाटा संस के आईपीओ को लेकर टाटा ट्रस्ट्स का रुख निगेटिव रहा है।

शापूरजी पालोनजी ग्रुप को मिलेगा फायदा

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार टाटा ट्र्स्ट्स के वाइस चेयरमैन श्रीनिवासन के मुताबिक इस कदम से शापूरजी पालोनजी (SP) ग्रुप को टाटा संस में अपनी 18.37% हिस्सेदारी को कैश में बदलने का मौका मिलेगा। यह इस माइनॉरिटी शेयरहोल्डर की लंबे समय से चली आ रही माँग है, जो अपना कर्ज चुकाना चाहता है।

श्रीनिवासन का मानना है कि टाटा संस की पब्लिक लिस्टिंग से न सिर्फ माइनॉरिटी शेयरहोल्डर्स के लिए वैल्यू बढ़ेगी, बल्कि टाटा संस को अपनी ग्रोथ की रफ्तार बनाए रखने के लिए जरूरी कैपिटल भी मिलेगी।

जुलाई 2025 में पास किए गए प्रस्ताव के उलट है श्रीनिवासन का बयान

श्रीनिवासन का यह बयान Tata Trusts द्वारा 28 जुलाई 2025 को पास किए गए प्रस्ताव के उलट है। उस प्रस्ताव में Tata Sons को एक अनलिस्टेड प्राइवेट एंटिटी के रूप में बनाए रखने का निर्णय लिया गया था, ताकि संभावित IPO की दिशा में बढ़ रहे रेगुलेटरी दबाव का सामना किया जा सके।
हाल ही में, Noel Tata की अध्यक्षता में Tata Trusts ने Tata Sons के चेयरमैन N Chandrasekaran से कहा था कि वे लिस्टिंग से बचने के लिए सभी विकल्पों पर विचार करें। साथ ही, SP Group के संभावित निकास (exit) पर भी चर्चा शुरू करें।

बढ़ रही है फूट

टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की बहुमत हिस्सेदारी है। ये हिस्सेदारी लगभग 66% है। बढ़ते दबाव के बीच (जिसमें संभावित रेगुलेटरी आदेश, SP ग्रुप की मांगें और अंदरूनी मतभेद शामिल हैं) ऐसा माना जा रहा है कि ट्रस्ट्स के बीच फूट बढ़ती जा रही है।
ट्रस्टियों का एक तबका लिस्टिंग को अनिवार्य और शेयरधारकों के हितों के अनुरूप मानता है, जबकि दूसरा तबका इसका विरोध करता है और नियंत्रण व विरासत को बनाए रखने के लिए एक अनलिस्टेड ढांचे को प्राथमिकता देता है।

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